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Written By दीपक असीम

संगीत का शो युद्ध की भाषा

सुर क्षेत्र
भारत और पाकिस्तान के बीच क्या सिर्फ युद्ध, महायुद्ध, विश्वयुद्ध, संग्राम, महासंग्राम आदि ही हो सकते हैं? क्या दोस्ती नहीं हो सकती? जुगलबंदी नहीं हो सकती? खेलकूद नहीं हो सकते? इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हर सांस्कृतिक और खेल गतिविधि को युद्ध के जुनून में क्यों बदलता है?

दोपहर के कई अगंभीर अखबारों में बिलावजह सनसनी फैलाने की जो प्रवृत्ति होती है, वही टीवी चैनलों में दस गुना ज्यादा होकर है। अभी पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के उभरते गायकों को मिलाकर एक सिंगिंग रियलिटी शो चल रहा है। वैसे तो इसका नाम "सुर क्षेत्र" रखा गया है, मगर इसे "भारत और पाकिस्तान के बीच संगीत का महायुद्ध" कहकर प्रचारित किया जा रहा है।

कार्यक्रम के विज्ञापनों में भी सारा साजो-सामान युद्ध का ही है। भारत किसी बहुत छोटे से देश से भी क्रिकेट क्यों न खेले, इसके ब्योरों का जो कार्यक्रम टीवी पर दिखाया जाता है, उसमें हमेशा ही युद्ध, महायुद्ध, महामुकाबला जैसे शब्दों की भरमार रहती है। विजुअल इफेक्ट भी युद्ध और जंग के मैदान वाला रहता है। यह खतरनाक है। हमेशा युद्ध की मानसिकता में जीना अच्छी बात नहीं हो सकती।

अब संगीत में कहाँ का युद्ध? दोनों देशों का संगीत अलग-अलग नहीं है। यहाँ तक कि लोकगीत भी एक जैसे हैं। पाकिस्तानी टीवी सीरियल अगर आप देखें तो पाएँगे कि उनमें किस दर्जा हिन्दुस्तानीपन है। जिस संगीत के महायुद्ध का जिक्र हो रहा है, उसमें हिमेश रेशमिया का होना और ज्यादा चिंता की बात है।

हिमेश रेशमिया गायक जैसे भी हों, पर आदमी बहुत गहरे नहीं हैं। अभी तक वे जितने रियलिटी शोज में दिखाई दिए हैं, उन्होंने एक नेक और भले आदमी की छाप नहीं छोड़ी है। वे चिड़चिड़े हैं, घमंडी हैं, जरा-सी बात पर बहुत बुरा मान जाने वाले शख्स हैं। सांप्रदायिकता के मामले में उनकी स्थिति क्या है, यह साफ नहीं है।

ऐसा आदमी क्या किसी देश का प्रतिनिधित्व कर सकता है, फिर चाहे वो संगीत ही क्यों न हो। इसकी क्या गारंटी है कि शो के आयोजक टीआरपी के लिए दोनों देशों के गायकों के बीच नकली-असली नोक-झोंक नहीं दिखाएँगे।

इस शो के माई बाप "जी टीवी" के वही गजेंद्रसिंह हैं, जिन्होंने पिछली बार "संगीत का महायुद्ध" जैसा शो रचा था और शहरों-शहर उत्तेजक पोस्टर भी लगवाए थे। इसकी बहुत आलोचना भी हुई थी। वही गजेंद्रसिंह एक बार फिर नफरतें जगाकर अपना शो हिट कराने की ताक में हैं।

इन दिनों पाकिस्तानी कलाकारों के खिलाफ माहौल वैसा नहीं है, जैसा तीन-चार बरस पहले था। हमारे देश के ख्यात गायकों ने बहुत ही संकीर्णता का परिचय देते हुए कई पाकिस्तानी कलाकारों की मुखालिफत की थी। असल चीज उनकी अपनी असुरक्षा और जलन थी। इस चक्कर में शकील जैसे हास्य कलाकार को जाना पड़ा था। स्टार वन के भी कई मशहूर कलाकारों को अपना बिस्तर बाँधना पड़ा। कई गायक भी विदा हुए।

अब वीना मलिक, राहत फतेह अली खाँ और अदनान सामी मौजूद हैं। कुछ दिनों बाद तो लोग यही भूल जाएँगे कि वीना मलिक या राहत फतेह अली खाँ पाकिस्तानी हैं। अन्य बहुत से कलाकारों का आना जारी है।

कलाकारों के आने-जाने से दोनों देशों की सांस्कृतिक फिजा को नई हवाएँ मिलती हैं। "तेरे बिन लादेन" बनाने वाली अली भी अब मुंबईकर सरीखे हो गए हैं। पाकिस्तानी कलाकारों के खिलाफ माहौल खराब करने वाली पार्टियाँ खामोश हैं। ऐसे में "भारत और पाकिस्तान के बीच संगीत का महायुद्ध" होने की बात सुनकर डर लगता है।

कर्ताधर्ताओं को चाहिए कि टीवी पर संयमित भाषा का इस्तेमाल सुनिश्चित करें। याद रहे कि अगर टीवी ज्यादा ही छुट्टा सांड हुआ तो सरकार को नकेल डालनी होगी और वो नकेल जितना नुकसान बुरों का नहीं करेगी, उतना अच्छे लोगों का कर सकती है।
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दीपक असीम