बिग बॉस : भलेपन पर भारी पड़ता भोलापन
लाजिम है दिल के साथ रहे पासबाने-अक्ल / लेकिन कभी-कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे। "बिग बॉस" के घर के वो सदस्य, जो नहीं जीत पाए जगप्रसिद्ध शायर अल्लामा इकबाल का यही शेर गुन रहे होंगे। विंदू को लोगों ने क्यों पसंद किया कारण यही कि विंदू बहुत दिल से जिंदगी जीते थे। दरअसल विंदू एक इत्तफाक का नाम है। इत्तफाक यह कि पता नहीं कैसे विंदू की आत्मा दागदार होने से बच गई। पाठ्य पुस्तकों में छपे सदाचारी उपदेशों के बरखिलाफ हमें अपने बड़े यही नसीहत देते हैं कि कैसे सिर्फ अपना फायदा देखा जाए, कैसे झूठ बोला जाए, कैसे लोगों को इस्तेमाल किया जाए और फिर कैसे तर्क द्वारा अपने गलत काम का बचाव किया जाए। बहुत से लोगों को तो ये नसीहतें सिखाना भी नहीं पड़तीं, वे जैसे पेट से ही ये सब सीखकर आते हैं। बहरहाल इन नसीहतों का असर यह होता है कि आदमी बड़ा होते-होते पत्थर हो जाता है। फिर यह भी सिखाया जाता है कि रोना बहादुरी का काम नहीं है। रोते कमजोर हैं...। इत्तफाक से विंदू दारासिंह पर ये नसीहतें असर नहीं डाल पाईं और उनका दिल मोम का मोम रह गया। उनकी भावुकता, उनकी उदारता, उनकी आवाज में बजती सचाई और उनकी नेकनीयती पर लोग फिदा हो गए। ऐसा आदमी जो जरा-सी बात पर धारोधार रोने लगे, हमें कहाँ नजर आता है? रोना कमजोरी की निशानी नहीं है, बल्कि ताजे और जिंदा हृदय की पहचान है। जो रोता है उसकी हँसी में चाँदी की घंटियाँ बजती हैं। रोने वाले के रोने में भी एक सुंदरता होती है और हँसने में भी। विंदू दारासिंह ने कभी कमजोर के ऊपर अपना गुस्सा उस तरह नहीं निकाला जैसा कमाल खान ने निकाला था। विंदू कायर नहीं थे। उन्होंने कमाल खान को एक बार लगभग खींचकर जिम से बाहर निकाल दिया था। विंदू लंपट नहीं थे। उनके साथ में रहने वाली किसी भी महिला या लड़की की तरफ कभी कामुक नजर से नहीं देखा और कभी अश्लील बात नहीं की। हाँ, शर्लिन को जरूर कुछ गंदा बोला था, मगर उस वक्त विंदू गुस्से में थे। छोटा बच्चा भी गंदी अश्लील गालियाँ देता है, पर बस बच्चे की ही तरह। पूनम ढिल्लो के प्रति विंदू श्रद्धा से भरे थे। जैसे हनुमान सीता मैया से बात करते हों। पूनम ढिल्लो को हमेशा विंदू ने पीठ पीछे भी "पूनमजी" ही कहा। पूनम ढिल्लो बेहद भली औरत साबित हुईं, मगर उनका भलापन स्वतःस्फूर्त नहीं था। कई बार उन्होंने गुस्से को दबाया और वो किया जो औचित्यपूर्ण था जबकि विंदू सहज ही वो करता था, जो करना चाहिए था। विंदू का भोलापन पूनम के भलेपन से जीत गया। प्रवेश राणा को वोट किन लोगों ने किए नहीं पता। शायद उनकी तरह एरोगेंट बनना चाहने वाले लड़कों ने, उसकी जवानी पर मरने वाली लड़कियों ने, महिलाओं ने...। मगर अंत में जीत हुई विंदू की। विंदू की जीत दरअसल यह बताती है कि हमें किस तरह के लोग पसंद हैं। हम खुद वैसे नहीं हैं, पर चाहते हैं कि हमें जो भी मिले, वो विंदू की तरह भोलाभाला, सदाशयी, मदद को तत्पर और नेकनीयत हो। "
बिग बॉस" का इरादा झगड़ों से टीआरपी बटोरने का रहता है, मगर अंत में जीत भले की होती है। जेम्स हेडली चेइज के उपन्यास पढ़ते समय आपकी कानूनी हमदर्दी समाज की तरफ रहती है मगर दिल उसके अपराधी पात्रों के साथ। लेकिन अंत में जीतता है कानून और समाज...। यहाँ उलटा था। हम "बिग बॉस" देखते थे झगड़ों और टंटों के लिए मगर हम चाहते थे कि भले लोग जीतें। वैसा ही हुआ है।