हर विद्यार्थी में मौजूद है एक शिक्षक

एक पत्र , छात्रों के नाम

WDWD
हमारी शिक्षा प्रणाली की यह विडंबना क्यों है? पुस्तकों में छपा हुआ ही ब्रह्मसत्य है? चाहे वह कितना ही अप्रासंगिक हो। वही शाही फरमान है? शिक्षकों को कक्षा में उसे ही पढ़ देना है और विद्या‍र्थियों को रटकर वही उत्तर पुस्तिका में लिख देना है?

और जाने-अनजाने उस कँटीली प्रतिस्पर्धा में शामिल हो जाना है, जिसकी अंतिम परिणति है सर्वोच्च अंक?

एकता, सद्‍भावना, संस्कार, सहिष्णुता और सौहार्द जैसे सुखद शब्दों से रच-पच इस देश के छात्रों में यह कैसा विषैला बीजारोपण है? क्या दे रहे हैं शिक्षक उन्हें? पिछड़ने का भय और पछाड़ने की दक्षता?

ऐसे कुंठित और असुरक्षित मानस के चलते कैसे एक स्वतंत्र व्यक्ति के निर्माण, विकास और रक्षण की कल्पना की जा सकती है?

क्यों असमर्थ हैं हम यह शिक्षा देने में कि 'तुम भी जीतो, मैं भी जीतूँ? क्यों नहीं निर्मित कर पा रहे हैं हम वह परिवेश, जिसमें हर विद्यार्थी जीता हुआ अनुभव करे।

जीत ईर्ष्या पैदा करती है, हार वैमनस्य। 'तुम भी जीतो मैं भी जीतूँ' की भावना के पोषण से ही तो 'सर्वे भवन्तु सुखिन: ' का संस्कार जन्म ले सकेगा।

मैं आपकी हमउम्र शिक्षिका हूँ, फिर भी जब आप लोगों की आँखों में सपनों के समंदर देखती हूँ तो हृदय से कोटि-कोटि आशीर्वाद निकलते हैं। आशीर्वाद की अवस्था नहीं है पर न जाने क्यों शिक्षक होने का अनुपम अहसास मात्र ही मुझे ऐसा करने के लिए बाध्य कर देता है।

मैं आपको कई बार डाँटती हूँ, क्योंकि मुझे दु:ख होता है जब आपको बँधी-बँधाई लीक पर चलते हुए देखती हूँ।
उस 'व्यवस्था' का शिकार होते हुए देखती हूँ, जो सीमित पाठ्‍यक्रम देती है और उसमें से भी महत्वपूर्ण प्रश्नों को रट लेने का सबक देती है।

तब भावनाओं के अतिरेक में मैं बोलती हूँ - अनवरत्-अनथक...! ताकि आपके मन के तारों को झंकृत कर सकूँ और ओजस्वी बना सकूँ।

मेरे विद्यार्थियों, आप उस युग में जी रहे हैं, जिसमें स्रोतों की प्रचुरता है, आगे बढ़ने के बहुत से द्वार हैं पर याद रखना, छोटी सफलता के छोटे द्वारों के लिए आपका कद बहुत बड़ा है।

प्रतिस्पर्धा की प्रक्रिया में, ऊँचाई की उत्कंठा में और तेजी की त्वरा में यह मत भूलना कि महत्वपूर्ण सफलता नहीं बल्कि वह रास्ता है जिस पर चलते हुए आप उसे हासिल करते हैं। आपने पढ़ा भी होगा कि जो लोग विनम्रता और नेकी के ऊँचे रास्ते पर चलते हैं उन्हें 'ट्रैफिक' का खतरा कभी नहीं होता।

आप मेरे सुयोग्य सुशील विद्यार्थी हैं, मेरे शिक्षिका होने की सबसे अहम वजह। यदि प्रथम व्याख्‍यान में आपने धैर्य, अनुशासन और गरिमा का परिचय नहीं दिया होता तो आज मैं कहाँ होती शिक्षिका? मेरी समझ, ज्ञान, वैचारिकता और अभिव्यक्ति आपके बेखौफ , बेबाक प्रश्नों से ही तो समृद्ध और विस्तारित हो सकी है।

आपकी प्रफुल्लता ही मेरे अध्यापन की प्रेरणा है। आपकी प्रखर मनीषा और जिज्ञासु संस्कार ही मुझे निरंतर पठन-अध्ययन के लिए उत्साहित करते हैं। आपका स्नेह और सम्मान ही मेरे विश्वास को मजबूती देता है।

आज का दिन हमारा नहीं आपका है, आपके 'कर्तव्य बोध' पर ही हमारे 'अस्तित्व बोध' का प्रश्न टिका है।
इस वक्त बहुत-सी काव्य पंक्तियाँ याद आ रही हैं। क्यों न अटलजी की पंक्तियाँ आपको भेंट करूँ?

WDWD
'छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता
टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता
मन हारकर मैदान नहीं जीते जाते
न ही मैदान जीतने से मन ही जीते जाते हैं

माँ शारदा से प्रार्थना है कि आप मन भी जीतें और मैदान भी...।
शुभकामनाओं सहित,

आपकी ही
स्मृति आदित्य|
स्मृति जोशी



और भी पढ़ें :