उज्जैन के हर नाम में एक कथा छुपी है... जरूर पढ़ें

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भोगवती और हिरण्यवती- इन दोनों नामों का समावेश भी उपर्युक्त नामों के अंतर्गत हो जाता है। समस्त प्रकार के भोगों से युक्त होने के कारण भोगवती और सुवर्ण की अधिकता से हिरण्यवती। इन दोनों नामों का समावेश अमरावती, विशाला एवं कनकश्रृंगा नाम में किया जाता है। 
उपर्युक्त समस्त नाम उज्जयिनी की पृथक-पृथक विशेषताओं का दिग्दर्शन कराते हैं। कनकश्रृंगा नाम यहां पर स्थित ऊंचे-ऊंचे रत्नमणि-मुक्तामंडित तोरणद्वारों से सुशोभित पासादों का बोध कराता है। कुशस्थली नाम यहां की पवित्रता और प्रमुख देवताओं की स्‍थिति का बोध कराता है। अवन्तिका नाम सबके पालन की सुव्यवस्था और सुरक्षा का बोध कराता है। शत्रुओं और असुरों पर की गई विजय की स्मृति उज्जयिनी नाम से होती है। इस नाम से यहां के योद्धाओं के असीम पराक्रम का भी बोध होता है। पद्मावती नाम श्रीसंपन्नता और वैभव का परिचय देता है। कुमुद्वती नाम यहां के नैसर्गिक सौन्दर्य और रमणीय प्रकृति का बोधक है। महाकाल वन, क्षेत्र, पीठ, देवों के विशाल मंदिर आदि देवताओं के निवास स्‍थान के रूप में इसके अमरावती नाम की सार्थकता है। विशाला नाम इस क्षेत्र की विस्तीर्णता के साथ श्री और संपन्नता का बोध कराता है। प्रतिकल्पा नाम इस पुरी की अचल स्‍थिति को सूचित करता है। 
 
समग्र रूप से यदि दृष्टिपात करें तो इन नामों के माध्यम से उज्जयिनी का भव्य चित्र उपस्थित हो जाता है। यह विशाल क्षेत्रफल वाली, ऐश्वर्य और वैभव से युक्त तथा अचल और सुरक्षित नगरी थी। यहां उत्तुंग महल और विशाल पवित्र मंदिर थे। यह प्रकृति की रमणीय स्थली थी।
 
आधुनिक समय में यह 'उज्जयिनी' नाम से प्रख्यात है। 'उज्जयिनी' शब्द का प्रयोग कब से प्रारंभ हुआ, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। पाणिनी ने (500 ई.पू.) अपनी अष्टाध्यायी में वरणादि गण-पाठ में 'उज्जयिनी' का नामोल्लेख किया है।
 
कालिदास और शूद्क ने भी प्रमुख रूप से 'उज्जयिनी' नाम का प्रयोग किया है। अत: यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ईसा पूर्व 6ठी शताब्दी से इस नाम का प्रयोग होने लगा था। इस नाम को प्रसिद्ध होने और साहित्यिक ग्रंथों में स्‍थान प्राप्त करने के लिए कुछ समय अवश्य लगा होगा। अत: यह नाम ईसा पूर्व 6ठी शताब्दी से पहले ही प्रचलित हो गया होगा। यही नाम प्रचलन में आते-आते उज्जैन हो गया। 
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