Sankashti Chaturthi puja timing: फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। संकष्टी चतुर्थी व्रत की सबसे खास बात यह है कि इसमें चंद्रोदय के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन भक्त पूरे दिन उपवास रखकर रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं और भगवान गणेश की विधिवत पूजा करते हैं। 'द्विजप्रिय' का अर्थ है — ब्राह्मणों और विद्वानों के प्रिय, और इस स्वरूप में भगवान गणेश की पूजा करने से विद्या, विवेक और निर्णय क्षमता में वृद्धि होती है।
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द्विजप्रिय चतुर्थी का महत्व
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द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी तिथि और शुभ मुहूर्त
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चंद्रोदय का समय
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पूजा विधि
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द्विजप्रिय संकष्टी कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक संकष्टी चतुर्थी व्रत रखने से जीवन के कष्ट, आर्थिक परेशानियां और मानसिक तनाव दूर होते हैं। साल 2026 में यह व्रत 5 फरवरी, गुरुवार को रखा जाएगा। यहां व्रत से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है:
1. द्विजप्रिय चतुर्थी का महत्व
मान्यता है कि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से व्यक्ति के जीवन से सभी बड़े संकट या विघ्न दूर हो जाते हैं और उसे अच्छी सेहत, सुख-समृद्धि एवं सौभाग्य की प्राप्ति होती है। विशेष रूप से यह व्रत मानसिक शांति और अटके हुए कार्यों को पूरा करने के लिए फलदायी माना जाता है।
2. द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी तिथि और शुभ मुहूर्त
चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 5 फरवरी, 2026 को मध्यरात्रि 12:09 से।
चतुर्थी तिथि समाप्त: 6 फरवरी, 2026 को मध्यरात्रि 12:22 पर।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी गुरुवार, फरवरी 5, 2026 को
उदया तिथि 5 फरवरी होने के कारण इसी दिन व्रत रखा जाएगा।
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 05:22 से 06:15 तक।
अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:13 से 12:57 तक।
3. चंद्रोदय का समय
संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य के बिना अधूरा माना जाता है।
संकष्टी के दिन चंद्रोदय का समय- 09:35 से 09:50 पी एम के बीच (स्थान के अनुसार समय में थोड़ा अंतर हो सकता है)।
4. पूजा विधि
स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान गणेश के सामने व्रत का संकल्प लें।
गणेश स्थापना: एक साफ चौकी पर पीला या लाल कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश (द्विजप्रिय स्वरूप) की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
पूजन सामग्री: भगवान को जल, अक्षत, सिंदूर, दूर्वा (21 गांठें), फूल और धूप-दीप अर्पित करें।
भोग: गणपति जी को उनके प्रिय मोदक या लड्डू का भोग लगाएं।
पाठ: संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें और 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का जाप करें।
द्विजप्रिय संकष्टी कथा
द्विजप्रिय संकष्टी व्रत कथा के अनुसार युवनाश्व नामक एक राजा सतयुग के समय में शासन करते थे। उनकी सभा में एक ब्राह्मण थे, जो सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता थे। जिनका नाम विष्णुशर्मा था, उनके सात पुत्र एवं सात पुत्रवधु थीं। उम्र बढ़ने पर विष्णुशर्मा वृद्ध हो गए एवं उनकी अवस्था जर्जर होती गई।
उनकी इस अवस्था के कारण छह बहुओं ने उनका तिरस्कार कर दिया, किंतु सातवीं सबसे छोटी बहू पूर्ण निष्ठाभाव से उनकी सेवा करने लगी। विष्णुशर्मा प्रकाण्ड ज्ञानी थे, अतः बहु की सेवा से संतुष्ट होकर उन्होंने अपनी बहु को संकष्टी चतुर्थी व्रत के विषय में बताया एवं व्रत पालन करने का निर्देश दिया।
अपने ससुर की आज्ञानुसार, छोटी बहु ने द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत का पूर्ण श्रद्धाभाव से नियमपूर्वक किया, अत: इस व्रत के फलस्वरूप वह समस्त प्रकार के भौतिक सुख-साधन से संपन्न होकर आनंदमयी जीवन व्यतीत करके अंत समय में सद्गति को प्राप्त हो गई। अतः इस कथा के अनुसार भगवान श्रीगणेश की विशेष कृपा प्राप्त करने हेतु द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत अवश्य ही सबको करना चाहिए।
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