जानिए सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्न

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(8) वराहमिहिर

पं. सूर्यनारायण व्यास के अनुसार विक्रम की सभा के रत्न आदि वराहमिहिर थे। वे ज्योतिष के ज्ञाता थे। वृद्ध वराहमिहिर के रूप में इनका उल्लेख मिलता है। वृद्ध वराहमिहिर विषयक सामग्री अद्यावधि काल के गर्त में छिपी है। वृहत्संहिता, वृहज्जातक आदि ग्रंथों के कर्ता वराहमिहिर गुप्त युग के थे, ऐसा वे मानते हैं।

वराहमिहिर ज्योतिष के प्रकांड विद्वान थे। उन्होंने ज्योतिष विषयक अनेक ग्रंथों का प्रणयन किया। वे ग्रंथ हैं- वृहत्संहिता, वृहज्जातक, समाससंहिता, लघुजातक, पञ्चसिद्धांतिका, विवाह-पटल, योगयात्रा, वृहत्यात्रा, लघुयात्रा। इनमें पञ्चसिद्धांतिका को छोड़कर प्राय: सभी ग्रंथों पर भट्टोत्पल ने टीका ग्रंथों का प्रणयन किया। वराहमिहिर ने अपने ग्रंथों में यवनों के प्रति आदर प्रगट किया है। उन्होंने 36 ग्रीक शब्दों का प्रयोग किया है, परंतु उन शब्दों का रूपांतर संस्कृत में कर प्रयोग किया है। उन्होंने यवन ज्योतिषियों के नामों का भी उल्लेख किया है अत: स्पष्ट है कि ग्रीक से यहां का व्यापारिक संबंध था इसी कारण साहित्यिक आदान-प्रदान हुआ। उनके ग्रंथों में यवनों के उल्लेख की आधारभूमि संभवत: यही है।







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