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Written By WD Feature Desk
Last Updated : बुधवार, 17 सितम्बर 2025 (11:19 IST)

shradh 2025: ऑनलाइन श्राद्ध धार्मिक रूप से सही या गलत?, जानिए शास्त्रों में क्या है विधान

online shradh karna chahiye ya nahi
online shradh karna chahiye ya nahi: आज के डिजिटल युग में, जब हर काम ऑनलाइन हो रहा है, तो धार्मिक अनुष्ठानों और कर्मकांडों ने भी इस तकनीक को अपना लिया है। अब लोग घर बैठे ही गया, हरिद्वार, नासिक जैसे पवित्र तीर्थ स्थलों पर पितरों का श्राद्ध और पिंडदान ऑनलाइन बुक कर सकते हैं। यह प्रक्रिया उन लोगों के लिए बेहद सुविधाजनक है जो किसी कारणवश इन स्थानों पर जाकर श्राद्ध नहीं कर पाते। लेकिन, क्या ऑनलाइन श्राद्ध की यह प्रक्रिया वास्तव में सही है और क्या इसे धार्मिक रूप से स्वीकार किया गया है? यह एक ऐसा प्रश्न है जो आस्था और आधुनिकता के बीच खड़ा है।

शास्त्रों में क्या है विधान?
हमारे प्राचीन शास्त्रों और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, पितरों की शांति और मोक्ष के लिए किया जाने वाला श्राद्ध कर्म स्वयं अपने हाथों से करना ही शुभ माना गया है। शास्त्रों में श्राद्ध की प्रक्रिया को एक अत्यंत व्यक्तिगत और भावनात्मक अनुष्ठान माना गया है। यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, प्रेम और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक तरीका है। जब हम अपने हाथों से तर्पण करते हैं, पिंडदान अर्पित करते हैं और ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, तो उस क्रिया में हमारी भावनाएं, हमारा संकल्प और हमारी ऊर्जा सीधे हमारे पितरों तक पहुँचती है।

ऑनलाइन श्राद्ध और उसकी सीमाएं
शास्त्रों में इस प्रक्रिया को इसलिए उचित नहीं माना गया है, क्योंकि केवल पैसे देकर किसी दूसरे व्यक्ति से श्राद्ध करवाना और तर्पण करवाना पितरों की आत्मा को पूरी तरह संतुष्ट नहीं करता। यह एक तरह का प्रतिनिधित्व मात्र है, जिसमें श्राद्धकर्ता की प्रत्यक्ष भागीदारी और भावनात्मक संबंध अनुपस्थित होता है। श्राद्ध कर्म में व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक उपस्थिति, उसका समर्पण और उसकी भक्ति सबसे महत्वपूर्ण होती है। यह माना जाता है कि जब व्यक्ति स्वयं पिंडदान करता है, तो वह अपने पितरों के साथ एक गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित करता है, जो केवल एक ऑनलाइन बुकिंग के माध्यम से संभव नहीं है।

तीर्थ स्थलों पर जाकर श्राद्ध का महत्व
शास्त्रों में तीर्थ स्थल पर जाकर विधि-विधान से पिंडदान करना ही श्रेष्ठ माना गया है। गया, हरिद्वार, नासिक जैसे स्थान अपने आप में ही आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण हैं। इन स्थानों की पवित्रता और वहां की सकारात्मक ऊर्जा श्राद्ध के पुण्य को कई गुना बढ़ा देती है। जब हम इन स्थानों पर जाकर अपने हाथों से पितरों के लिए कर्मकांड करते हैं, तो हम न केवल उनकी आत्मा को शांति प्रदान करते हैं, बल्कि स्वयं भी मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतोष प्राप्त करते हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि ऑनलाइन श्राद्ध एक सुविधा है, लेकिन यह शास्त्रों में बताए गए श्राद्ध के मूल सिद्धांत के खिलाफ है। पितरों की आत्मा की शांति के लिए किया गया यह कर्म अपनी पूरी पवित्रता और महत्व के साथ तभी फलदायी होता है, जब इसे पूरी श्रद्धा और अपने हाथों से किया जाए। इसलिए, यदि संभव हो तो तीर्थ स्थल पर स्वयं जाकर ही श्राद्ध और पिंडदान करना चाहिए।
 

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