10 Ancient Rules of Sanatan Dharma: सनातन धर्म केवल कर्मकांडों का समूह नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक पद्धति है। हमारे धर्मग्रंथों में कुछ ऐसे शाश्वत नियम बताए गए हैं, जिन्हें 'धर्म' का आधार माना गया है। इन नियमों की महत्ता इसी बात से समझी जा सकती है कि त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और द्वापर में लीलाधर श्रीकृष्ण ने भी मानव अवतार में इनका पूर्णतः पालन किया। आइए जानते हैं वे 10 प्राचीन नियम, जो आज के आधुनिक युग में भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यपरिग्रहा यमाः।- पतंजलि के योगसूत्र ॥ 2.30॥
भावार्थ : अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह ये पांच यम है।
1. सत्य (Truth)
सनातन का सबसे पहला नियम है 'सत्य'। सनातन धर्म में सत्य का सबसे ज्यादा महत्व है। सत्य का अर्थ केवल सही बोलना नहीं, बल्कि सत्य के मार्ग पर अडिग रहना है। सत्य ही सनातन धर्म का मूल है। प्रभु श्रीराम के पूर्वज राजा हरिशचंद्र ने सत्य की रक्षार्थ अपना सबकुछ त्याग दिया था। उसी प्रकार से प्रभु श्रीराम ने भी सत्य पर कायम रहकर सबकुछ त्याग दिया। श्रीराम ने पिता के वचन को निभाने के लिए राजपाट त्याग दिया, वहीं श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में सत्य के मार्ग पर चलने के महत्व को बताया। उन्होंने कहा कि सत्य ही धर्म है और धर्म की रक्षा करना ही कर्तव्य है। श्रीकृष्ण ने तो यहां तक कहा की सत्य ही ईश्वर है। सत्य को समझने के लिए एक तार्किक बुद्धि की आवश्यकता होती है। तार्किक बुद्धि आती है भ्रम और द्वंद्व के मिटने से। भ्रम और द्वंद्व मिटता है मन, वचन और कर्म से एक समान रहने से। इससे जीवन का लक्ष्य साधने में आसानी होती है।
2. अहिंसा (Non-violence)
'अहिंसा परमो धर्म:'। इसका अर्थ केवल शारीरिक चोट न पहुंचाना नहीं है, बल्कि मन, कर्म और वाणी से भी किसी को कष्ट न देना है। हालांकि, सनातन धर्म 'आततायी' के विरुद्ध शस्त्र उठाने को भी धर्म सम्मत मानता है, जैसा श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सिखाया। प्रभु श्रीराम ने कभी भी हिंसा का सहरा नहीं लिया परंतु उन्हें सत्य और न्याय की रक्षा के लिए धनुष उठाने पर मजबूर किया गया। स्वयं के साथ अन्याय या हिंसा को होने देना भी हिंसा और अपराध है। क्रोध करना, लोभ, मोह पालना, किसी वृत्ति का दमन करना, शरीर को कष्ट देना आदि सभी स्वयं के साथ हिंसा है। अहिंसक भाव रखने से मन और शरीर स्वस्थ होकर शांति का अनुभव करता है। जो व्यक्ति अहिंसा का भाव रखता है उसके मन से संताप मिट जाता है।
3. अस्तेय (Non-stealing)
अस्तेय का अर्थ है चोरी न करना। इसमें दूसरों की वस्तुओं या विचारों पर अपना अधिकार न जताना शामिल है। यह नियम व्यक्ति को संतोषी बनाता है। रावण ने माता सीता का हरण किया था और इसी तरह दुर्योधन ने भी पांडवों के हक को हथिया लिया था। अस्तेय को अचौर्य भी कहते हैं अर्थात चोरी की भावना नहीं रखना। धन, भूमि, संपत्ति, नारी, विद्या आदि किसी भी ऐसी वस्तु जिसे अपने पुरुषार्थ से अर्जित नहीं किया या किसी ने हमें भेंट या पुरस्कार में नहीं दिया, को लेने के विचार मात्र से ही अस्तेय खंडित होता है। चोरी की भावना समाज में न्याय को भी खंहित करती है। चोरी की भावना से चित्त में जो असर होता है उससे मानसिक प्रगति में बाधा उत्पन्न होती है। मन रोगग्रस्त हो जाता है। अचौर्य की भावना से मौलिकता और पुरुषार्थ का जन्म होता है। दोनों से मन और शरीर मजबूत बनते हैं।
।।शौचसंतोषतप: स्वाध्यायेश्वरप्राणिधानानि नियमा:।।- योगदर्शन 2/32
भावार्थ : शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान ये पांच नियम है।
4. शौच (Purity)
शौच का अर्थ है शुद्धि। इसमें बाहरी शरीर की स्वच्छता के साथ-साथ मन की शुद्धि (ईर्ष्या, द्वेष से मुक्ति) भी अनिवार्य है। प्रभु श्रीराम का जीवन मन की इसी निर्मलता का प्रतीक है। इसी तरह भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीमद्भगवद्गीता में शुद्धि के महत्व को बताया है।
मूलत: शौच का तात्पर्य है पाक और पवित्र हो जाओ, तो आधा संकट यूं ही कटा समझो। शौच अर्थात शुचिता, शुद्धता, शुद्धि, विशुद्धता, पवित्रता और निर्मलता। पवित्रता दो प्रकार की होती है- बाहरी और भीतरी। बाहरी या शारीरिक शुद्धता भी दो प्रकार की होती है। पहली में शरीर को बाहर से शुद्ध किया जाता है। इसमें मिट्टी, उबटन, त्रिफला, नीम आदि लगाकर निर्मल जल से स्नान करने से त्वचा एवं अंगों की शुद्धि होती है। दूसरी शरीर के अंतरिक अंगों को शुद्ध करने के लिए योग में कई उपाय बताए गए है- जैसे शंख प्रक्षालन, नेती, नौलि, धौती, गजकरणी, गणेश क्रिया, अंग संचालन आदि। भीतरी या मानसिक शुद्धता प्राप्त करने के लिए दो तरीके हैं। पहला मन के भाव व विचारों को समझते रहने से। जैसे- काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार को त्यागने से मन की शुद्धि होती है। इससे सत्य आचरण का जन्म होता है।
5. इंद्रिय निग्रह (Control over Senses)
इंद्रिय निग्रह सनातन धर्म और योग विज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। अपनी इंद्रियों (आंख, कान, जीभ आदि) को वश में रखना। जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों का दास है, वह कभी शांति नहीं पा सकता। श्रीकृष्ण ने गीता में स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के यही लक्षण बताए हैं। स्थितप्रज्ञता साक्षी भाव से प्राप्त होती है। अक्सर लोग समझते हैं कि इंद्रिय निग्रह का अर्थ अपनी इच्छाओं को मारना है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। इसका अर्थ है अपनी इंद्रियों को 'लगाम' देना। जब भी मन कुछ गलत देखने या खाने का करें, तो खुद से पूछें- "क्या यह मेरे लिए सही है?"
प्रभु श्रीराम ने राजसी सुख-सुविधाओं के बीच रहते हुए भी वनवास के दौरान कठिन तपस्वी जीवन अपनाकर इंद्रिय निग्रह का परिचय दिया। उन्होंने कभी भी विलासिता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। श्रीकृष्ण को 'ऋषिकेश' कहा जाता है, जिसका अर्थ है 'इंद्रियों का स्वामी'। उन्होंने संसार के सभी भोगों के बीच रहते हुए भी कभी उनमें आसक्ति नहीं दिखाई। वे पूरी तरह निर्लिप्त रहे।
6. दान (Charity)
सनातन परंपरा में अपनी आय और सामर्थ्य का एक हिस्सा समाज कल्याण के लिए देना अनिवार्य है। दान केवल धन का नहीं, बल्कि विद्या, अभय और अन्न का भी होता है। दान का अर्थ केवल पैसा देना नहीं है। दान वह है जो सुपात्र (सही व्यक्ति) को, सही समय पर और बिना किसी अहंकार के दिया जाए। माना जाता है कि दान करने से पिछले बुरे कर्मों का प्रभाव कम होता है और पुण्य का संचय होता है। श्रीकृष्ण ने सुदामा के दो मुट्ठी चावल के बदले उन्हें तीनों लोकों की संपत्ति दे दी थी। यह सिखाता है कि दान की मात्रा नहीं, बल्कि दान के पीछे की भावना महत्वपूर्ण है।
एक प्रसिद्ध दोहा है: "ज्यों जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम। दोउ हाथ उलीचिये, यही सयानो काम॥" (अर्थात्: जैसे नाव में पानी बढ़ने पर उसे बाहर फेंकना जरूरी है, वैसे ही घर में धन बढ़ने पर उसे दान करना ही बुद्धिमानी है।)
7. तप (Austerity)
लक्ष्य प्राप्ति के लिए अनुशासन और कठिनाइयों को सहना 'तप' है। श्रीराम का 14 वर्ष का वनवास एक महा-तप था, जिसने उन्हें 'मर्यादा पुरुषोत्तम' बनाया। भगवान श्रीकृष्ण को भी वन में जाकर तप करना पड़ा था। मथुरा छोड़ने के बाद उन्होंने कई दिनों तक तप और ध्यान किया था। इससे पहले उज्जैन में संदिपनी ऋषि के यहां उन्होंने तप और आत्म संयम की शिक्षा ली थी।
आत्मसंयम का नाम है तप। तप से ही तपस्या शब्द की उत्पत्ति हुई है। तप का अर्थ दैहिक कष्ट कतई नहीं है। सतत अभ्यास करते रहना ही तप है। मन और शरीर की गुलामी से मुक्त होना ही तप है। तप की शुरुआत आप छोटे-छोटे संकल्प से कर सकते हैं। अपनी बुरी आदतों को छोड़ने का संकल्प ले। आहार संयम का संकल्प लें और फिर धीरे-धीरे सरल से कठिन तप की और बढ़ते जाएं। तप से सिद्धियों का मार्ग खुलता है। तप से मानसिक और शारीरिक शक्ति का विकास होता है। शरीर, मन और मस्तिष्क हमेशा सेहतमंद बने रहते हैं।
8. स्वाध्याय (Self-study)
नियमित रूप से धर्मग्रंथों का अध्ययन और आत्म-चिंतन करना। स्वयं को जानना ही ईश्वर को जानना है। यह नियम मानसिक विकास और वैचारिक स्पष्टता के लिए आवश्यक है। स्वाध्याय का अर्थ है स्वयं का और ग्रंथों का अध्ययन करना। भगवान राम ने अपने प्रारंभिक काल में गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र से शिक्षा दीक्षा ली थी। श्रीकृष्ण ने ऋषि गर्ग मुनि, अंगिरस, सांदिपनी और वेद व्यासजी से शिक्षा ग्रहण की थी। स्वाध्याय का अर्थ है स्वयं का और ग्रंथों का अध्ययन करना। अच्छे विचारों का अध्ययन करना और इस अध्ययन का अभ्यास करना। जीवन को नई दिशा देने की शुरुआत आप छोटे-छोटे संकल्प से कर सकते हैं। संकल्प लें कि आज से मैं बदल दूँगा वह सब कुछ जिसे बदलने के लिए मैं न जाने कब से सोच रहा हूँ। अच्छा सोचना और महसूस करना स्वाध्याय की पहली शर्त है।
9. क्षमा (Forgiveness)
शक्तिशाली होने के बावजूद क्षमा करना सबसे बड़ा गुण है। जहाँ श्रीराम ने समुद्र को राह न देने पर भी अंततः क्षमा भाव रखा, वहीं श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की 100 गलतियां क्षमा कीं। क्षमा भी धर्म का मूल है। क्षमा करने से मन निर्मल हो जाता है। किसी के भी प्रति बदले की भावना नहीं रखना चाहिए। यह भावना जीनन को संकट में डाल देती है। खासकर अपनों से तो कतई नहीं। इसलिए सभी को क्षमा करना सीखें।
10. ईश्वर प्रणिधान (Surrender to Divine)
स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देना। यह भाव व्यक्ति को अहंकार से मुक्त करता है। जब हम यह मान लेते हैं कि हम केवल 'निमित्त' हैं और कर्ता ईश्वर है, तब जीवन से तनाव समाप्त हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन को इसी बात की शिक्षा दी है। उन्होंने कहा कि यदि तू यह समझता है कि तू ही कर्ता है तो यह सत्य नहीं है तू तो निमित्त मात्र है। जिन्हें तो मारने की बात कर रहा है उन्हें तो मैं पहले ही मार चुका हूं। तू अपने मन से कर्ता का भाव निकाल दें क्योंकि तेरे करने से कुछ नहीं हो रहा है। कर्ताधर्ता तो कोई और है।
ईश्वर प्राणिधान का अर्थ है, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण। ईश्वर के प्रति पूर्ण विश्वास। यदि आप ईश्वर के प्रति समर्पित होने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं तो अपने ईष्ट के प्रति समर्पित रहें, इमानदार बने रहें। एकनिष्ठ बनें। ईश्वर या ईष्ट के प्रति अडिग रहने वाले के मन में दृढ़ता आती है। यह दृढ़ता ही उसकी जीत का कारण है। चाहे सुख हो या घोर दुःख, उसके प्रति अपनी आस्था को डिगाएं नहीं। इससे आपके भीतर पांचों इंद्रियों में एकजुटता आएगी और लक्ष्य को भेदने की ताकत बढ़ेगी।
क्यों जरूरी हैं ये नियम?
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मानसिक शांति और चरित्र निर्माण के लिए ये 10 नियम एक मार्गदर्शक की तरह हैं। यदि हम इनका 10% भी अपने जीवन में उतार लें, तो हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।
"धर्मो रक्षति रक्षितः"- अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।