हिन्दू धर्म : ययाति कौन थे, जानिए...

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
 
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हमें वेद-पुराणों में उल्लेखित ययाति के कुल-खानदान को याद रखना चाहिए, क्योंकि इसी से एशिया की जातियों का जन्म हुआ। ययाति से ही आगे चंद्रवंश चला जिसमें से यदुओं, तुर्वसुओं, आनवों और द्रुहुओं का वंश चला। जिस तरह में के 12 पुत्रों से इसराइल-अरब की जाति बनी, उसी तरह ययाति के 5 पुत्रों से अखंड भारत (अफगानिस्तान, पाकिस्तान, हिन्दुस्तान, बांग्लादेश, बर्मा, थाईलैंड आदि) की जातियां बनीं। हालांकि ययाति के 10 पुत्र थे। याकूब और ययाति की कहानी कुछ-कुछ मिलती-जुलती है। यह शोध का विषय हो सकता है। जम्बूद्वीप के महान सम्राट कुरु> > शतपथ ब्राह्मण के अनुसार पुरुवस को ऐल भी कहा जाता था। पुरुवस का विवाह उर्वशी से हुआ जिससे उसको आयु, वनायु, शतायु, दृढ़ायु, घीमंत और अमावसु नामक पुत्र प्राप्त हुए। अमावसु एवं वसु विशेष थे। अमावसु ने कान्यकुब्ज नामक नगर की नींव डाली और वहां का राजा बना। आयु का विवाह स्वरभानु की पुत्री प्रभा से हुआ जिनसे उसके 5 पुत्र हुए- नहुष, क्षत्रवृत (वृदशर्मा), राजभ (गय), रजि, अनेना। प्रथम नहुष का विवाह विरजा से हुआ जिससे अनेक पुत्र हुए जिसमें ययाति, संयाति, अयाति, अयति और ध्रुव प्रमुख थे। इन पुत्रों में यति और ययाति प्रीय थे।
ययाति प्रजापति ब्रह्मा की पीढ़ी में हुए थे। ययाति की 2 पत्नियां देवयानी और शर्मिष्ठा थीं। देवयानी गुरु शुक्राचार्य की पुत्री थी, तो शर्मिष्ठा दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री थीं। पहली पत्नी देवयानी के यदु और तुर्वसु नामक 2 पुत्र हुए और दूसरी शर्मिष्ठा से द्रुहु, पुरु तथा अनु हुए। ययाति की कुछ बेटियां भी थीं जिनमें से एक का नाम माधवी था। माधवी की कथा बहुत ही व्यथापूर्ण है।

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ययाति के प्रमुख 5 पुत्र थे- 1.पुरु, 2.यदु, 3.तुर्वस, 4.अनु और 5.द्रुहु। इन्हें वेदों में पंचनंद कहा गया है। 7,200 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9,200 वर्ष पूर्व ययाति के इन पांचों पुत्रों का संपूर्ण धरती पर राज था। पांचों पुत्रों ने अपने- अपने नाम से राजवंशों की स्थापना की। यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रुहु से भोज, अनु से मलेच्छ और पुरु से पौरव वंश की स्थापना हुए।

पुराणों में उल्लेख है कि ययाति अपने बड़े लड़के यदु से रुष्ट हो गया था और उसे शाप दिया था कि यदु या उसके लड़कों को राजपद प्राप्त करने का सौभाग्य न प्राप्त होगा।- (हरिवंश पुराण, 1,30,29)। ययाति सबसे छोटे बेटे पुरु को बहुत अधिक चाहता था और उसी को उसने राज्य देने का विचार प्रकट किया, परंतु राजा के सभासदों ने ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए इस कार्य का विरोध किया। (महाभारत, 1,85,32)

 

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