क्या था बालि की शक्ति का राज, जानिए

कहा जाता है कि माया नामक असुर स्त्री के दो पुत्र थे- मायावी तथा दुंदुभि। दुंदुभि महिषरूपी असुर था। दुंदुभि को अपनी शक्ति पर दंभ हो गया था। वह पहाड़ के समान दिखाई देता था। उसने सबसे पहले सागर राज को युद्ध के लिए ललकारा, लेकिन सागर राज ने कहा कि ऐसे वीर से वह युद्ध करने में असमर्थ है। आपको तो गिरियों के राजा हिमवान को ललकारना चाहिए। हालांकि सागर राजा दुंदुभि के दंभ को तोड़ सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। सागर राज की तरह ही हिमवान ने कहा कि तुम्हारे जैसे वीर को इंद्र के पुत्र बालि से युद्ध करना चाहिए, तब दुंदुभि ने किष्किंधा के द्वार पर जाकर बालि को ललकारा।

बालि ने पहले तो दंभी दुंदुभि को समझाने की कोशिश की, परंतु जब वह नहीं माना तो बालि ने दुंदुभि को बड़ी सरलता से हराकर उसका वध कर दिया। इसके पश्चात बालि ने दुंदुभि के निर्जीव शरीर को उछालकर एक ही झटके में एक योजन दूर फेंक दिया। शरीर से टपकती रक्त की बूंदें महर्षि मतंग के आश्रम में गिरीं, जो कि ऋष्यमूक पर्वत में स्थित था। क्रोधित मतंग ने बालि को शाप दे डाला कि यदि बालि कभी भी उनके आश्रम के एक योजन के दायरे में आया तो वह मृत्यु को प्राप्त होगा। इसी कारण बालि कभी भी ऋष्यमूक पर्वत पर कभी भी नहीं जाता था और ने बालि से बचने के लिए यहीं पर शरण ली थी।

बालि का मायावी के साथ घोर युद्ध और एक वर्ष बाद...




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