पंचतंत्र का रचनाकाल : महामहोपाध्याय पं. सदाशिव शास्त्री के अनुसार पंचतंत्र के रचयिता विष्णु शर्मा थे और विष्णु शर्मा चाणक्य का ही दूसरा नाम था। चाणक्य ने ही वात्स्यायन नाम से कामसूत्र लिखा था। अतः पंचतंत्र की रचना चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में ही हुई है और इसका रचनाकाल 300 ईपू माना जा सकता है। लेकिन कुछ विद्वान ऐसा नहीं मानते। उनका कथन है कि चाणक्य का दूसरा नाम विष्णुगुप्त था, विष्णु शर्मा नहीं तथा उपलब्ध पंचतंत्र की भाषा की दृष्टि से तो यह गुप्तकालीन रचना प्रतीत होती है। महामहोपाध्याय पंडित दुर्गाप्रसाद शर्मा ने विष्णु शर्मा का समय अष्टम शतक के मध्य भाग में माना है, क्योंकि पंचतंत्र के प्रथम तंत्र में 8वीं शताब्दी के दामोदर गुप्त द्वारा रचित कुट्टिनीमत की फ्पर्यघ्कः स्वास्तरणम्य् इत्यादि आर्या देखी जाती है अतः यदि विष्णु शर्मा पंचतंत्र के रचयिता थे तो वे अष्टम शतक में हुए होंगे। हालांकि अधिकतर विद्वान मानते हैं कि श्री विष्णु शर्मा चंद्रगुप्त मौर्य के पश्चात ईसा पूर्व पहली शताब्दी में हुए होंगे।
हितोपदेश के रचयिता नारायण पंडित हैं। नारायण पंडित ने पंचतंत्र तथा अन्य नीति के ग्रंथों की मदद से इस अद्भुत ग्रंथ हितोपदेश का सृजन किया। इसके आश्रयदाता बंगाल के माण्डलिक राजा धवलचंद्रजी हैं। नारायण पंडित राजा धवलचंद्रजी के राजकवि थे।
जातक कथाओं का रचनाकाल : माना जाता है कि ये कहानियां गौतम बुद्ध ने ही अपने मुख से सुनाई थीं। गौतम बुद्ध का जन्म ईसा से 563 साल पहले हुआ था। बाद में इन कथाओं का संकलन तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व किया गया था। मथुरा के इतिहास और गुरुकुल कांगड़ी के आचार्य रामदेवजी के निश्चय के अनुसार गौतम बुद्ध काल 1760 विपू से 1680 विपू है तथा उनका मथुरा आगमन काल 1710 विपू है। यह निर्धारण बुद्ध ग्रंथ महावश, जैन ग्रंथ स्थाविरावली, हरवंश, विष्णु भागवत आदि पुराणों के आधार पर है। इसका मतलब 1702 ईसा पूर्व बुद्ध का जन्म हुआ था?
उपनिषदों की कथाएं अनादि काल से हमारे मनोरंजन और ज्ञान का स्रोत रही हैं। पहले के दादा और दादी ये कथाएं सुनाते रहते थे। वेद, पुराण, महाभारत, रामायण आदि की कथाएं प्राचीनकाल से लेकर आज तक ज्ञान और प्रेरणा का भंडार रहे हैं लेकिन उनमें भी उपनिषद की कथाएं बहुत ही महत्वपूर्ण हैं।
भवभूति, संस्कृत के महान कवि एवं नाटककार थे। उनके नाटक, कालिदास के नाटकों के समतुल्य माने जाते हैं। भवभूति, पद्मपुर में एक देशस्थ ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे। पद्मपुर महाराष्ट्र के गोंदिया जिले में महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित है। भवभूति ने विक्रम यानी उज्जैन के राजा विक्रमादित्य को वेताल नामक भूत की कथाओं का एक पात्र बनाया था।
कथासरित्सागर में 21,388 पद्म हैं और इसे 124 तरंगों में बांटा गया है। कथासरित्सागर स्रोत राजा सातवाहन के मंत्री 'गुणाढ्य' द्वारा रचित 'बड़कहा' (संस्कृत : बृहत्कथा) नामक ग्रंथ है।
सिंहासन बत्तीसी का पहला संस्करण मुनि क्षेभेन्द्र ने किया था। दूसरा बंगाल में वररुचि द्वारा किया गया। बाद में यह ग्रंथ देश की लगभग सभी भाषाओं में अनूदित हुआ।
तेनालीराम के जीवन जुड़ीं सभी कहानियों के संग्रह को 'तेनालीराम की कथा' कहते हैं। तेनालीराम की कहानियां आज भी समाज में प्रचलित और लोकप्रिय हैं। कृष्ण देवराय के राज्य में रामलिंगम नाम का यह व्यक्ति बहुत ही हंसोड़ था और दूर-दूर तक इसकी ख्याति थी। एक दिन गांव में जब कृष्ण देवराय के राजगुरु आए तो तेनालीराम ने उनकी खातिरदारी इस कारण की कि वे उनको राजदरबार का दरबारी बना देंगे, लेकिन राजगुरु ने झूठा वादा करके तेनालीराम की खूब सेवाएं हासिल कीं। बाद में जब उनका राज खुला तो तेनालीराम खुद ही अपनी चतुराई से कृष्ण देवराय के राजदरबारी बन बैठे। बस यहीं से उनकी और राजगुरु के बीच प्रतिद्वंद्विता शुरू हो जाती है। यह एक सच्ची कहानियों का संग्रह है।