हिन्दू धर्म के 10 रहस्यमयी ज्ञान, जानिए....

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
3. : आयुर्वेद हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा दिया गया अनमोल उपहार है। 'आयुर्वेद' शब्द दो शब्दों आयुष्+वेद से मिलकर बना है जिसका अर्थ है जीवन विज्ञान। संसार की प्राचीनतम पुस्तक ऋग्वेद में भी आयुर्वेद के अतिमहत्वपूर्ण सिद्धांतों का वर्णन है। आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद एवं विश्व का आदिचिकित्सा विज्ञान है। आयुर्वेद के प्रथम उपदेशक धन्वंतरि ऋषि को माना जाता है। उसके बाद कई ऋषि और मुनियों ने आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार किया। बाद में च्यवन, सुश्रुत और चरक ऋषि का नाम उल्लेखनीय है।  
चरक मत के अनुसार मृत्युलोक में आयुर्वेद के अवतरण के साथ अग्निवेश का नाम उल्लेखनीय है। सर्वप्रथम ब्रह्मा से प्रजापति ने, प्रजापति से अश्विनी कुमारों ने, उनसे इन्द्र ने और इन्द्र से भारद्वाज ने आयुर्वेद का अध्ययन किया। फिर तदनंतर पुनर्वसु आत्रेय ने अग्निवेश, भेल, जतू, पाराशर, हारीत और क्षारपाणि नामक 6 शिष्यों को आयुर्वेद का उपदेश दिया। इन 6 शिष्यों में सबसे अधिक बुद्धिमान अग्निवेश ने सर्वप्रथम एक संहिता का निर्माण किया- अग्निवेश का, जिसका प्रति संस्कार बाद में चरक ने किया और उसका नाम चरक संहिता पड़ा, जो आयुर्वेद का आधार स्तंभ है।
 
सुश्रुत के अनुसार काशीराज देवीदास के रूप में अवतरित भगवान धन्वंतरि के पास अन्य महर्षियों के साथ सुश्रुत जब आयुर्वेद का अध्ययन करने हेतु गए और उनसे निवेदन किया। उस समय भगवान धन्वंतरि ने उन लोगों को उपदेश करते हुए कहा कि सर्वप्रथम स्वयं ब्रह्मा ने अथर्ववेद के उपवेद आयुर्वेद को एक सहस्र अध्याय-शत सहस्र श्लोकों में प्रकाशित किया। धन्वंतरि ने कहा कि ब्रह्मा से दक्ष प्रजापति, उनसे अश्विनी कुमार तथा उनसे इन्द्र ने आयुर्वेद का अध्ययन किया। चरक संहिता तथा सुश्रुत संहिता में वर्णित इतिहास एवं आयुर्वेद के अवतरण के क्रम में क्रमश: आत्रेय संप्रदाय तथा धन्वंतरि सम्प्रदाय ही मान्य है।
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