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Written By WD Feature Desk
Last Updated : शनिवार, 24 जनवरी 2026 (14:36 IST)

शंकराचार्य कैसे बनते हैं? क्या हैं इसके नियम और अभी कितने शंकराचार्य हैं?

आदि शंकराचार्य, adi shankaracharya
क्या कोई भी व्यक्ति शंकराचार्य बन सकता है? इस पद तक पहुंचने के लिए किन योग्यताओं और नियमों का पालन करना पड़ता है, यह सवाल अक्सर लोगों के मन में रहता है। यह पद सनातन हिंदू परंपरा का सर्वोच्च आध्यात्मिक दायित्व माना जाता है, जिसे प्राप्त करने के लिए कठोर नियम और लंबी साधना आवश्यक होती है। चलिए जानते हैं कि कोई कैसे बनता है शंकराचार्य।
 

आदि शंकराचार्य के दशनामी संप्रदाय:

आदि शंकराचार्य ने सबसे पहले हर क्षेत्र के हिन्दुओं को संगठित करने और जातिवाद को समाप्त करने के लिए दसनामी सम्प्रदाय की स्थापना की। यह दस संप्रदाय निम्न हैं:- 1.गिरि, 2.पर्वत और 3.सागर। इनके ऋषि हैं भ्रगु। 4.पुरी, 5.भारती और 6.सरस्वती। इनके ऋषि हैं शांडिल्य। 7.वन और 8.अरण्य के ऋषि हैं काश्यप। 9.तीर्थ और 10. आश्रम के ऋषि अवगत हैं। इन्हीं दशमानी संप्रदाय से योग्य चार लोगों को लेकर चार मठों की स्थापना की।
 

आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित 4 मठ:

आदि शंकराचार्य ने भारत की चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की थी। इन मठों का उद्देश्य न केवल धर्म की रक्षा करना था, बल्कि भारत को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से एक सूत्र में बांधना भी था। यहाँ इन चारों मठों की भौगोलिक स्थिति, उनके वेद और महत्व का विवरण दिया गया है:
 
1. श्रृंगेरी शारदा पीठ (दक्षिण भारत)
स्थान: चिकमगलूर, कर्नाटक।
वेद: यह पीठ यजुर्वेद को समर्पित है।
महत्व: यह आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित पहला मठ माना जाता है। यहाँ की अधिष्ठात्री देवी मां शारदा (सरस्वती) हैं।
महावाक्य: "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ही ब्रह्म हूँ)।
 
2. गोवर्धन पीठ (पूर्वी भारत)
स्थान: पुरी, ओडिशा।
वेद: यह पीठ ऋग्वेद से जुड़ी है।
महत्व: यह प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर से संबद्ध है। यहाँ के शंकराचार्य का ओड़िशा के सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में बहुत ऊंचा स्थान है।
महावाक्य: "प्रज्ञानं ब्रह्म" (ज्ञान ही ब्रह्म है)।
 
3. द्वारका शारदा पीठ (पश्चिमी भारत)
स्थान: द्वारका, गुजरात।
वेद: यह पीठ सामवेद का प्रतिनिधित्व करती है।
महत्व: यह भगवान कृष्ण की नगरी द्वारका में स्थित है। इसे 'कालिका मठ' के नाम से भी जाना जाता है।
महावाक्य: "तत्त्वमसि" (वह ब्रह्म तुम्हीं हो)।
 
4. ज्योतिर्मठ / ज्योतिष पीठ (उत्तर भारत)
स्थान: बद्रीनाथ (जोशीमठ), उत्तराखंड।
वेद: यह पीठ अथर्ववेद को समर्पित है।
महत्व: हिमालय की गोद में स्थित यह पीठ सबसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में है। हाल ही में जोशीमठ में आई भू-धंसाव की आपदा के कारण यह पीठ काफी चर्चा में रही है।
महावाक्य: "अयमात्मा ब्रह्म" (यह आत्मा ही ब्रह्म है)।
 

आदि शंकराचार्य ने इन मठों पर नियुक्ति किए अपने उत्तराधिकारी:

आदिशंकराचार्य सभी चारों मठों को स्थापित करने के बाद उन्होंने दशनामी संप्रदाय के अपने शिष्यों में से चार शिष्यों को मठ का उत्तराधिकारी बनाया। 1. पद्मपाद (सनन्दन), 2. हस्तामलक 3. मंडन मिश्र 4. तोटक (तोटकाचार्य)। इन्हीं शिष्यों ने अपने जाने के पहले अपने उत्तराधिकारी घोषित करके चले गए। इसी तरह यह परंपरा चलती रही।
 

शंकराचार्य पद की चयन प्रक्रिया क्या है?

शंकराचार्य का पद कोई साधारण धार्मिक पद नहीं है, बल्कि यह एक 'संवैधानिक' धार्मिक संस्था है। इसका चयन आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'महानुशासनम्' ग्रंथ में दिए गए नियमों के आधार पर होता है। यह प्रक्रिया काफी कठिन और लंबी होती है।
 
1. अनिवार्य योग्यताएं:
महानुशासन के अनुसार, एक नए शंकराचार्य के पास निम्नलिखित गुण होने अनिवार्य हैं:
तपोनिष्ठ और ब्रह्मचारी: उम्मीदवार को बचपन से ही नैष्ठिक ब्रह्मचारी होना चाहिए और कठोर तपस्या का अनुभव हो।
वेदों का विद्वान: उसे चारों वेदों, वेदांत, संस्कृत व्याकरण और दर्शनशास्त्र का गहरा ज्ञान होना चाहिए।
दशनामी संप्रदाय: वह आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित 10 संन्यासी संप्रदायों (जैसे सरस्वती, भारती, पुरी, गिरी आदि) में से एक से संबद्ध होना चाहिए। हालांकि आजकल इन नियमों में थोड़ी शिथिलता है।
उच्च आचरण: उनका चरित्र बेदाग और आचरण पवित्र होना चाहिए।
 
2. चयन की प्रक्रिया:
जब एक शंकराचार्य ब्रह्मलीन होने (मृत्यु) के करीब होते हैं, या उनके जाने के बाद, चयन की प्रक्रिया कुछ इस तरह चलती है:
उत्तराधिकार (Nomination): वर्तमान शंकराचार्य अक्सर अपने जीवनकाल में ही अपने सबसे योग्य शिष्य को 'भावी शंकराचार्य' के रूप में चुन लेते हैं।
काशी विद्वत परिषद की भूमिका: यदि उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया गया है, तो काशी विद्वत परिषद (विद्वानों की सबसे पुरानी संस्था) और अन्य तीन मठों के शंकराचार्यों की राय ली जाती है।
विद्वानों की सभा: उम्मीदवार की विद्वत्ता की परीक्षा लेने के लिए शास्त्रार्थ या चर्चाएं होती हैं।
पट्टाभिषेक: एक बार नाम तय होने के बाद, विशेष पूजा-अर्चना और वैदिक रीति-रिवाजों के साथ उनका पट्टाभिषेक (ताजपोशी) होता है।
 

वर्तमान में कौन है इन चारों मठों के उत्तराधिकारी?

1. श्रृंगेरी शारदा पीठ (दक्षिण भारत)
वर्तमान शंकराचार्य: जगद्गुरु शंकराचार्य श्री भारती तीर्थ महास्वामी जी (36वें शंकराचार्य)।
उत्तराधिकारी (भावी): श्री विधुशेखर भारती महास्वामी जी। इन्हें 2015 में उत्तराधिकारी के रूप में मनोनीत (नियुक्त) किया गया था।
 
2. गोवर्धन पीठ (पूर्वी भारत - पुरी)
वर्तमान शंकराचार्य: जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी (145वें शंकराचार्य)।
स्थिति: स्वामी निश्चलानंद जी वर्तमान में सक्रिय हैं। इस पीठ में सामान्यतः उत्तराधिकारी की घोषणा वर्तमान शंकराचार्य के जीवनकाल के अंतिम समय में या उनके जाने के बाद 'महानुशासनम्' के अनुसार की जाती है। अभी आधिकारिक तौर पर किसी एक नाम की 'उत्तराधिकारी' के रूप में पट्टाभिषेक जैसी घोषणा नहीं हुई है।
 
3. द्वारका शारदा पीठ (पश्चिमी भारत)
वर्तमान शंकराचार्य: जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती जी।
विवरण: स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी के ब्रह्मलीन होने के बाद, 2022 में स्वामी सदानंद सरस्वती जी को द्वारका पीठ का शंकराचार्य नियुक्त किया गया था।
 
4. ज्योतिर्मठ / ज्योतिष पीठ (उत्तर भारत)
वर्तमान शंकराचार्य: जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी।
विवरण: स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी के जाने के बाद, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी को ज्योतिष पीठ की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। हालांकि, इस पीठ को लेकर कुछ कानूनी विवाद अदालत में विचाराधीन रहे हैं, लेकिन वर्तमान में वे ही इस पीठ के प्रमुख के रूप में कार्य कर रहे हैं और प्रसिद्ध हैं।
 

क्या है ज्योतिष पीठ के उत्तराधिकार का विवाद

ज्योतिर्मठ के दो दावेदार: ज्योतिष पीठ (बद्रीनाथ) के मामले में दो शिष्यों ने खुद को उत्तराधिकारी बताया, जिससे मामला सालों तक कोर्ट में रहा। मुख्य विवाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और स्वामी वासुदेवानंद के गुटों के बीच रहा है।
 
अदालती हस्तक्षेप: स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती (जिनके ब्रह्मलीन होने के बाद अब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती) और स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के बीच इस पद को लेकर लंबे समय तक अदालती लड़ाई चली। कोर्ट ने समय-समय पर योग्यता और चयन प्रक्रिया के आधार पर इन नियुक्तियों पर सवाल उठाए हैं, जिससे भक्तों के बीच भ्रम की स्थिति बनी रही।
 
उल्लेखनीय है कि द्वारका और ज्योतिष पीठ, इन दोनों पीठों का कार्यभार लंबे समय तक स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी के पास था। उनके ब्रह्मलीन होने के बाद ही ये दोनों पीठें अलग-अलग शंकराचार्यों के अधीन आईं।
स्वामी सदानंद सरस्वती- द्वारका (गुजरात)
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती- ज्योतिर्मठ (उत्तराखंड)
 

असली बनाम नकली शंकराचार्य और मठ:

असली बनाम नकली: विवाद का एक पक्ष यह भी है कि देश में कई साधु-संत खुद को 'शंकराचार्य' घोषित कर देते हैं। वर्तमान में चारा मठों के अलावा अन्य कई मठों की स्थापना भी हो चली है जिसके चलते हिंदुओं में असली और नकली शंकराचार्य को लेकर भी विवाद चल रहा है। 
 
आदि शंकराचार्य ने केवल चार मठ (पुरी, द्वारका, श्रृंगेरी और बद्रीनाथ) स्थापित किए थे। हालांकि, कई अन्य मठ (जैसे कांची कामकोटि) भी प्राचीनता का दावा करते हैं। आधिकारिक चारों पीठों का मानना है कि इनके अलावा कोई भी स्वयं को शंकराचार्य नहीं कह सकता।
 
'अन्य' शंकराचार्य (विवाद का कारण)
इन 4 मुख्य पीठों के अलावा, भारत में कई अन्य मठ भी हैं जो खुद को 'शंकराचार्य' कहते हैं, जिसकी वजह से संख्या बढ़ी हुई दिखती है। इनमें प्रमुख है कामकोटि पीठ।
 
कांची कामकोटि पीठ (तमिलनाडु): यहाँ के प्रमुख को भी 'शंकराचार्य' कहा जाता है (वर्तमान में स्वामी विजयेंद्र सरस्वती जी)। हालांकि चारों मुख्य मठ इन्हें आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित 'पांचवां मठ' मानने पर एकमत नहीं हैं, लेकिन दक्षिण भारत में इनकी बहुत मान्यता है।
 
स्वयंभू शंकराचार्य: देश में कई अन्य संत भी हैं जो अपने नाम के आगे शंकराचार्य लगाते हैं, लेकिन 'महानुशासनम्' (मठों का संविधान) के अनुसार उन्हें आधिकारिक मान्यता नहीं दी जाती।
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