Bhojshala: मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक नगर धार की आबोहवा में आज भी राजा भोज के पांडित्य और परमार वंश के गौरव की महक महसूस की जा सकती है। भोजशाला केवल एक इमारत नहीं, बल्कि उस कालखंड का जीवित दस्तावेज है जब धार 'संस्कृति' और 'संस्कृत' का वैश्विक केंद्र हुआ करता था।
धार की भोजशाला: विद्या की देवी का वो भव्य धाम
सन् 1034 की बात है, जब कला और ज्ञान के उपासक राजा भोज ने धार में माँ सरस्वती (वाग्देवी) के एक ऐसे मंदिर का निर्माण कराया, जिसकी अनूठी मूर्ति और भव्यता की चर्चा सात समंदर पार तक पहुँची। यहाँ सिर्फ पूजा-अर्चना नहीं होती थी, बल्कि यह ज्ञान की वह पाठशाला थी जहाँ दूर-दराज से विद्यार्थी अपनी 'ज्ञान पिपासा' शांत करने आते थे। राजा भोज स्वयं योग, ज्योतिष, वास्तु और धर्मशास्त्रों के प्रकांड विद्वान थे और उनके शासन में एक साधारण नागरिक भी संस्कृत का ज्ञाता माना जाता था।
धार की भोजशाला: वास्तुकला या कविता?
वास्तु: भोजशाला की बनावट किसी काव्य से कम नहीं है। इसके खुले प्रांगण, नक्काशीदार स्तंभ और कलात्मक छतें तत्कालीन स्थापत्य कला की श्रेष्ठता चीख-चीख कर बताती हैं।
शिलालेखों पर नाटक: यहाँ काले पत्थर के विशाल शिलालेखों पर क्लासिकी संस्कृत में नाटक खुदे हुए हैं।
राजगुरु मदन की कृति: राजगुरु मदन द्वारा रचित नाटक 'पारिजातमंजरी' (जिसे 'पूर्रमंजरी' भी कहा गया है) यहाँ के पत्थरों पर आज भी अंकित है, जिसे बसंतोत्सव के समय मंचन के लिए लिखा गया था।
अनोखी वर्णमाला: यहाँ के खंभों पर धातु प्रत्यय माला और वर्णमाला उकेरी गई है, जो इसे दुनिया का एक दुर्लभ 'साहित्यिक स्मारक' बनाती है।
धार की भोजशाला: इतिहास के घाव और लंदन में कैद 'वाग्देवी'
समय का चक्र: समय का चक्र घूमा और इस वैभवशाली केंद्र पर हमलों के काले बादल छा गए। इतिहासकार शिवकुमार गोयल अनुसार 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने इस भव्य मंदिर को निशाना बनाया। खिलजी द्वारा ध्वस्त कराई गई भोजशाला के एक भाग पर 1401 में दिलावर खां गौरी ने मस्जिद बनवाई थी। दिलावर खां गौरी और महमूद शाह खिलजी के दौर में इसके स्वरूप को बदलकर यहाँ मस्जिद में नमाज शुरु करवा दी गई। अब इसे कमाल मौलाना मस्जिद कहते हैं जिसके पीछे की कहानी भी अलग है। कहते हैं कि वह मुगलों का जासूस था।
महमूद शाह खिलजी: सन् 1514 में महमूद शाह खिलजी ने शेष भाग पर भी मस्जिद बनवा दी। हिन्दू जनता ने अनेक ऐतिहासिक तथ्य प्रस्तुत कर यहां फिर से भोजशाला का निर्माण करने की मांग रखी है, लेकिन मामला अब कोर्ट में है। कहते हैं कि कि 1875 में यहां पर की गई खुदाई में सरस्वती देवी की एक प्रतिमा निकली थी। इस प्रतिमा को मेजर किनकेड नाम का अंग्रेज लंदन ले गया था जो अब लंदन के संग्रहालय में रखी है। हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में इस प्रतिमा को लंदन से से वापस लाए जाने की मांग भी की गई है।
विडंबना देखिए, जिस वाग्देवी की आराधना राजा भोज करते थे, उनकी वह विश्वप्रसिद्ध प्रतिमा आज अपनों से दूर लंदन के संग्रहालय में कैद है। आज भी साल में सिर्फ एक बार बसंत पंचमी पर माँ सरस्वती का तैलचित्र यहाँ लाया जाता है, जो सदियों पुरानी परंपरा की याद दिलाता है।
आज की भोजशाला: नियम और श्रद्धा
पुरातत्व विभाग: वर्तमान में भोजशाला केंद्रीय पुरातत्व विभाग (ASI) के संरक्षण में है। यहाँ आस्था और इतिहास का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है:
बसंत पंचमी: वर्ष में एक बार हिंदू समाज को यहाँ पूर्ण विधि-विधान से पूजा की अनुमति मिलती है।
मंगलवार की प्रार्थना: प्रति मंगलवार श्रद्धालु सूर्यास्त तक यहाँ निःशुल्क प्रवेश कर अक्षत और पुष्प अर्पित कर सकते हैं।
धार की भोजशाला: कैसे पहुँचें ज्ञान की इस नगरी तक?
धार पहुँचने का रास्ता बेहद सुगम है। यदि आप मांडू के दीदार के लिए निकल रहे हैं, तो धार आपका पहला पड़ाव होना चाहिए।
इंदौर से दूरी: मात्र 60 किमी (लगभग 1.5 घंटे का सफर)। हर 15 मिनट में बसें उपलब्ध हैं।
रेल मार्ग: रतलाम जंक्शन से धार की दूरी 92 किमी है।
लोकल: धार बस स्टैंड से आप ऑटो या पैदल चलकर आसानी से भोजशाला पहुँच सकते हैं।
भोजशाला केवल विवादों का केंद्र नहीं, बल्कि भारत की उस समृद्ध विरासत का प्रतीक है जिसने दुनिया को शून्य से लेकर खगोल विज्ञान तक का ज्ञान दिया। राजा भोज की यह कृति आज भी हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देती है।