नागरिक होने का अर्थ

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भारत के लोगों ने 20 जनवरी, 1949 को भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्ना लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए एक संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मसमर्पित किया। भारत के लोगों ने इस लोकतंत्रात्मक गणराज्य और संविधान से अपेक्षा की कि वह भारतवर्ष केसमस्त नागरिकों को न्याय, अभिव्यक्ति, स्वतंत्रता और समता प्राप्त कराएगा और बंधुता बढ़ाएगा। न्याय की अवधारणा में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की त्रिधारा समाहित है। बंधुता का उद्देश्य है कि व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित हो। प्रजातंत्र की उक्त अवधारणा उस संविधान की उद्देशिका से प्रतिध्वनित होती है, जो संविधान विश्व का सबसे बड़ा संविधान है और एक बेशकीमती दस्तावेज है। स्वतंत्र भारत के रूप में इस देश के उन कोटि-कोटि लोगों का वह स्वप्न साकार हुआ है जिसके लिए लक्ष्य-लक्ष्य लोगों ने अपने प्राणों का उत्सर्ग किया, लाठियाँ, गोलियाँ खाईं, जेल में चक्की और कोल्हू पीसे और न जाने कितने त्याग किए।

यही वह स्वप्न है जिसे देखकर अशफाक उल्ला खाँ जैसे शहीदों ने कहा था-

कभी वो दिन भी आएगा
जब अपना राज देखेंगे
जब अपनी ही जमीं होगी
जब अपना आसमाँ होगा।

WD|
रमेशचंद्र लाहोट(उच्चतम न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश)
क्या यह स्वप्न साकार हो सकता है? क्या भारतवर्ष के प्रत्येक नागरिक को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय मिल सका है? क्या प्रत्येक भारतवासी को वह स्वतंत्रता प्राप्त है, जिसमें वह अपने विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना के अधिकार का मुक्त प्रयोग कर सके? क्या भारतवर्ष के नागरिकों के बीच ऐसी बंधुता का प्रादुर्भाव हो चुका है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा सुप्रतिष्ठित है और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित है।



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