गंगोत्री और यमुनोत्री की यात्रा 'छोटा चारधाम' का अभिन्न हिस्सा है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित इन दोनों धामों की यात्रा न केवल धार्मिक रूप से, बल्कि प्राकृतिक सुंदरता के लिहाज से भी बेमिसाल है। हालांकि दोनों ही जगहों की यात्रा को केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम से ज्यादा कठिन मानी जाती है। कई यात्री यात्रा का प्रारंभ भी यहीं से करते हैं। यहाँ इन दोनों धामों के बारे में 10 खास जानकारियां दी गई हैं।
1. यात्रा का क्रम (The Ritual Order)
हिंदू परंपरा के अनुसार, चारधाम यात्रा हमेशा पश्चिम से पूर्व की ओर की जाती है। इसलिए सबसे पहले यमुनोत्री के दर्शन होते हैं और उसके बाद गंगोत्री की यात्रा की जाती है। इसके बाद केदारनाथ और अंत में बद्रीनाथ धाम की यात्री की जाती है।
2. कपाट खुलने और बंद होने का समय
ये दोनों मंदिर साल में केवल 6 महीने (गर्मियों में) ही खुलते हैं। आमतौर पर इनके कपाट अक्षय तृतीया (अप्रैल/मई) को खुलते हैं और दीपावली के आसपास भाई-दूज के दिन बंद कर दिए जाते हैं। यात्रा का समय मई से जून (गर्मियों में) सही माना गया है। यदि आप शांति से दर्शन करना चाहते हैं और ठंड सहन कर सकते हैं, तो सितंबर के अंत या अक्टूबर की शुरुआत सबसे बेहतरीन समय है।
3. यमुनोत्री का कठिन ट्रेक
यमनोत्री में यमुनाजी का मंदिर है। ऋषिकेश से 220 किमी का सड़क मार्ग तय करने के बाद फूलचट्टी नामक स्थान से यमनोत्री की चढ़ाई प्रारंभ होती है। फूलचट्टी तक श्रद्धालु अपनी इच्छानुसार बस या निजी वाहन से पहुंच सकते हैं। इसके बाद यमुनोत्री मंदिर तक पहुँचने के लिए जानकीचट्टी से लगभग 5-6 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई करनी पड़ती है। यात्री पैदल, पालकी या घोड़ों (खच्चर) का सहारा लेते हैं।
4. सूर्य कुंड और दिव्य शिला (यमुनोत्री)
यमुनोत्री मंदिर के पास 'सूर्य कुंड' नामक गर्म पानी का चश्मा (Hot Spring) है। भक्त यहाँ कपड़े की पोटली में चावल या आलू डालकर उबालते हैं, जिसे बाद में प्रसाद के रूप में घर ले जाया जाता है। मंदिर के पास स्थित 'दिव्य शिला' की पूजा सबसे पहले की जाती है। यमुना नदी का उद्गम कालिंद नामक पर्वत से हुआ है। कालिंद पर्वत से नदी का उद्गम होने की वजह से ही लोग इसे कालिंदी भी कहते हैं।
5. भागीरथी का उद्गम: गौमुख (गंगोत्री)
गंगोत्री मंदिर गंगा नदी (यहाँ इसे भागीरथी कहा जाता है) के तट पर स्थित है। लेकिन गंगा का वास्तविक स्रोत गौमुख ग्लेशियर है, जो गंगोत्री मंदिर से लगभग 18-19 किलोमीटर की कठिन पैदल दूरी पर स्थित है। यहां गंगा नदी ने धरती को छुआ था। ऋषि भागीरथ के प्रयास से गंगा पहले शिवजी की जटाओं में विराजमान हुई और फिर आगे गंगोत्री से मुख्य धारा बनाकर आगे बढ़ी।
6. मंदिर का निर्माण (गंगोत्री)
गंगोत्री के भव्य सफेद संगमरमर के मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी के अंत में गोरखा कमांडर अमर सिंह थापा ने करवाया था। बाद में जयपुर के राजघराने ने इसका पुनरुद्धार किया।
7. शीतकालीन निवास (Winter Abodes)
सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण जब कपाट बंद होते हैं, तो माँ यमुना की मूर्ति को खरसाली गांव में और माँ गंगा की मूर्ति को मुखबा गांव में लाया जाता है। सर्दियों में श्रद्धालु यहीं दर्शन करते हैं।
8. पंच प्रयाग और प्राकृतिक दृश्य
इन धामों के रास्ते में आप टिहरी बांध और सुंदर पहाड़ियों के साथ-साथ कई संगमों के दर्शन करते हैं। गंगोत्री के रास्ते में पड़ने वाला हर्षिल घाटी अपनी सेब की खेती और प्राकृतिक सुंदरता के लिए 'मिनी स्विट्जरलैंड' कहलाता है।
9. गर्म पानी के कुंड (गंगनानी)
गंगोत्री मार्ग पर 'गंगनानी' नामक स्थान है जहाँ ऋषि कुंड स्थित है। यहाँ गर्म पानी का प्राकृतिक कुंड है। मान्यता है कि मंदिर जाने से पहले श्रद्धालु यहाँ स्नान करके अपनी थकान मिटाते हैं और शुद्ध होते हैं।
10. समुद्र तल से ऊँचाई
यमुनोत्री: लगभग 3,293 मीटर।
गंगोत्री: लगभग 3,100 मीटर।
एक विशेष टिप:
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यमुनोत्री यात्रा के दौरान बड़कोट, सयानाचट्टी, जानकीचट्टी या हनुमान चट्टी में ठहर सकते हैं।
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गंगोत्री यात्रा के दौरान गंगोत्री धाम, हर्षिल, उत्तरकाशी में ठहर सकते हैं।
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गेस्ट हाउस, धर्मशाला, आश्रम और प्राइवेट होमस्टे में ठहर सकते हैं।
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इतनी ऊँचाई पर होने के कारण यहाँ ऑक्सीजन की थोड़ी कमी महसूस हो सकती है, इसलिए यात्रियों को धीरे-धीरे चढ़ने और खूब पानी पीने की सलाह दी जाती है।
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गंगोत्री और यमुनोत्री की यात्रा के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होता है, जिसे आप उत्तराखंड पर्यटन की वेबसाइट पर ऑनलाइन कर सकते हैं।
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यदि आप सरकारी बस, शेयर्ड टैक्सी (Shared Taxi) और साधारण धर्मशालाओं में रुकते हैं तो प्रति व्यक्ति खर्च: 12,000 से 18,000 रुपए तक खर्च आ सकता है।