जहाँ बहती है घी की नदी
रूपाल की पल्ली यात्रा
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ये तो हुई आस्था की बात, लेकिन इस आस्था को अंधविश्वास मानने वाले लोगों की कमी नहीं है। यहाँ के पढ़े-लिखे लोग इस परंपरा के खिलाफ हैं। इस परंपरा का पिछले 15 सालों से विरोध करने वाले 'पल्ली परिवर्तन अभियान' चलाने वाले लंकेश चक्रवर्ती ने कहा है कि इतने सारे घी का उपयोग पल्ली यात्रा पर करने के बजाय पल्ली पर केवल प्रतीक रूप में थोड़ा-सा घी चढ़ाकर बाकी का उपयोग सामाजिक कार्य में हो तो बहुत से गरीबों का आशीर्वाद मिलेगा।
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लेकिन हमें लंकेश चक्रवती की बातें बिलकुल सही लगीं। गौतम बुद्ध ने भी कहा था कि हमारे देश में जहाँ धर्म औऱ श्रद्धा सभी पर हावी है, ऐसे मुद्दों पर लोगों को एकत्रित करना बहुत मुश्किल होता है। लोग मानते हैं कि शास्त्र में जो लिखा है, वही सही है लेकिन मैं कहता हूँ कि जो करो सोच-विचार कर करो। हमारा भी अपने पाठकों से निवेदन है कि जो करें सोच-समझकर करें। आस्था और अंधविश्वास में बेहद पतली लकीर होती है। उसे समझें और बहुत सोचकर ही कोई कदम उठाएँ।
प्राचीन कथा-
ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन समय में पांडव अपनी पत्नी द्रौपदी के साथ वनवास के दरमियान रूपाल गाँव से निकले थे, तब माता वरदायिनी की आराधना करके एक साल के गुप्तवास के दरमियान पकड़े न जाएँ, इसलिए मानता मानी थी। एक साल बाद मानता पूर्ण होते ही पांडवों ने सोने की पल्ली बनवाकर, उस पर शुद्ध घी चढ़ाकर पूरे गाँव में पल्ली यात्रा निकाली थी। तब से शुरू हुई यह परंपरा आज तक जीवंत है। इस रथ को सभी वाणंगभाई सजाते हैं और कुम्हार लोग मिट्टी के पाँच कुंड बनाकर पल्ली यात्रा पर रखते हैं।
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