आधुनिकता के रंग में रंगती दादी माँ
पोते-पोतियों के संग दादी माँ
- सोमा मित्रा
पैंसठ वर्षीय शांता देवी पोते-पोतियों के हिसाब से अपनी जीवन शैली में बदलाव लाने की भरपूर कोशिश में लगी हैं। वे भी मानती हैं कि दोहरी कमाई में जुटे माँ-बाप के पास इतना समय नहीं है कि वे अपने बच्चों को उनकी संगीत कक्षा में, या उनके दोस्तों की जन्मदिन पार्टियों में या फिर तैराकी सिखाने के लिए ले जा सकें।
और न ही बच्चों को इन सब चीजों के लिए अकेले ही जाने दिया जा सकता है। ऐसे में दादा-दादी, नाना-नानी का सहारा ही लिया जा सकता है। शांतादेवी ने अपनी पोती की खातिर संगीत की स्वरलिपि सीखी। वे कहती हैं- 'मैं तो बेसुरी हूँ, पर मेरी नैना नैसर्गिक रूप से सांगीतिक प्रकृति की है।
मैं उसके लिए कम से कम स्वरलिपि तो सीख ही सकती थी। इसके अलावा मैं नन्ही-सी बच्ची के साथ भी रह लेती हूँ वर्ना उसे किसी आया के भरोसे छोड़ना पड़ता।' लेकिन सिर्फ संगीत ही नहीं, जिम्नास्टिक और लगातार बर्थ-डे पार्टियों में जाना भी उनकी समय सारणी का एक हिस्सा बन गया है।
परिवार के युवा सदस्यों के साथ कदम से कदम मिलाने के लिहाज से आज की दादियाँ फैशनेबल और सुंदर दिखने के तमाम तरीके अपनाती है। 'मेरी 15 वर्षीय पोती, ईशा अच्छी दिखने को लेकर काफी सजग रहती है। जब मैं उसके साथ उसके दोस्तों के पास जाती हूँ तो उसका आग्रह रहता है कि मैं कोई पाश्चात्य कपड़े पहनूँ। मैंने तो आजकल के बच्चों की पसंद पिज्जा, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक्स और मॉकटेल के प्रति भी अपना स्वाद विकसित कर लिया है।'
55 वर्षीय सुमन कपूर हँसकर कहती है- बढ़ती हुई कमाई के चलते आज की दादी माएँ भी इस नई दुनिया में हौले-हौले आती चली गई हैं। कामिनी अय्यर ने जब अपनी ढाई वर्षीय पोती के नाम की कुरिअर डाक प्राप्त की तो वे भौचक्क रह गईं क्योंकि उस डाक में आई 16 पुस्तकों की कीमत कोई 25000 रुपए थी। इतने पैसे में तो उनके दोनों बच्चों की पूरी शिक्षा संपन्न हो गई थी।
लेकिन शुरुआती अचंभा ढल जाने के बाद कामिनी ही अब इन पुस्तकों का इस्तेमाल सबसे ज्यादा करती हैं। 'अपनी पोती के संग इन पुस्तकों के बीहड़ से गुजरने के साथ-साथ मैं अपने ज्ञान में भी वृद्धि करती हूँ। मेरी शादी के वक्त मैं अपने स्कूल का अंतिम वर्ष ही पूरा कर पाई थी।' वे खुलासा करती हैं।
दिनों की पारंपरिक गृहस्थिन अब दुनिया भर को पूरे विश्वास के साथ लाँघ आती हैं। पर उसके लिए यह संक्रमण खूब चुनौतियों भरा रहा होगा, जबकि उसके बच्चों के लिए यह सब एक साधारण सी बात है। जीवन के आठवें दशक में चल रहीं कुसुमलता रॉय इसकी गवाह हैं।
20 साल पहले उनकी बेटी के जुड़वाँ बच्चे होने पर वे कोलकाता से यूएसए के न्यूजर्सी चली गई थीं। पुरानी यादें ताजा करते हुए वे कहती हैं- 'मैं अँगरेजी का एक शब्द भी नहीं बोल सकती थी। यूएसए की तो छोड़ो महानगरीय जीवन कैसा होता है, यह ज्ञान भी मुझे रत्तीभर न था। पर मैंने सब सीखा।
मेरे पहले अनुभवों में से एक अनुभव थोड़े दिनों के लिए भारत वापस आते वक्त रास्ते में, सिंगापुर के एक होटल के अपने कमरे में रूम सर्विस को लेकर था। तब से मैं ये सारी चीजें सीखती गई हूँ। पोते-पोतियों की खातिर सादे बंगाली भोजन से लेकर कॉन्टिनेंटल, चाइनीज और इटालियन खाना बनाना भी मैंने सीखा।' रॉय चहक कर कहती हैं।
ठीक इसी तरह 75 वर्षीय सरोज कुमारी भी अपने पुत्र के बच्चों के प्रति प्यार रखती हैं। साल में दो बार, जब उनका बेटा व उनकी बहू अपने काम से छुट्टी पर होते हैं तो वे अपने पोते-पोती के साथ रहने के लिए दक्षिण भारत से यूके की यात्रा करती हैं। वे जब भी विदेश जाती हैं, अपने साथ एक अदना-सा भारत जरूर ले जाती हैं और वहाँ बच्चों को यहाँ के जीवन की झलकी देती हैं- गाय को चारा वगैरह कैसे खिलाते हैं, घाघरा-चोली कैसे पहनते हैं, यहाँ तक कि भरतनाट्यम कैसे करें, आदि आदि।
'मैं अपने बेटे के परिवार के साथ स्कॉटलैंड, मलेशिया, श्रीलंका वगैरह गई हूँ और अपने पोते-पोतियों को घुमाने भी ले गई हूँ जबकि उनके माँ-बाप अपने व्यावसायिक कामों में भिड़े होते हैं। बदले में, उन लोगों ने मुझे ब्रिटिश लहजे में अँगरेजी बोलना सिखाया।' कहते हुए एक स्मित मुस्कान उनके चेहरे पर निखर आती है।
एक नया आधुनिक पहनावा, नए-नए स्वाद, सफर के लिए हर हमेशा तैयार सूटकेस और दोस्तों का दिन-ब-दिन बढ़ता फैलता दायरा। नए युग की इन दादी-माँओं ने अपने जोश और अपने नन्हे-मुन्नों के लिए अपने प्यार के बूते पीढ़ी-अंतराल को पाट-सा दिया है।
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NDऔर न ही बच्चों को इन सब चीजों के लिए अकेले ही जाने दिया जा सकता है। ऐसे में दादा-दादी, नाना-नानी का सहारा ही लिया जा सकता है। शांतादेवी ने अपनी पोती की खातिर संगीत की स्वरलिपि सीखी। वे कहती हैं- 'मैं तो बेसुरी हूँ, पर मेरी नैना नैसर्गिक रूप से सांगीतिक प्रकृति की है।
मैं उसके लिए कम से कम स्वरलिपि तो सीख ही सकती थी। इसके अलावा मैं नन्ही-सी बच्ची के साथ भी रह लेती हूँ वर्ना उसे किसी आया के भरोसे छोड़ना पड़ता।' लेकिन सिर्फ संगीत ही नहीं, जिम्नास्टिक और लगातार बर्थ-डे पार्टियों में जाना भी उनकी समय सारणी का एक हिस्सा बन गया है।
परिवार के युवा सदस्यों के साथ कदम से कदम मिलाने के लिहाज से आज की दादियाँ फैशनेबल और सुंदर दिखने के तमाम तरीके अपनाती है। 'मेरी 15 वर्षीय पोती, ईशा अच्छी दिखने को लेकर काफी सजग रहती है। जब मैं उसके साथ उसके दोस्तों के पास जाती हूँ तो उसका आग्रह रहता है कि मैं कोई पाश्चात्य कपड़े पहनूँ। मैंने तो आजकल के बच्चों की पसंद पिज्जा, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक्स और मॉकटेल के प्रति भी अपना स्वाद विकसित कर लिया है।'
55 वर्षीय सुमन कपूर हँसकर कहती है- बढ़ती हुई कमाई के चलते आज की दादी माएँ भी इस नई दुनिया में हौले-हौले आती चली गई हैं। कामिनी अय्यर ने जब अपनी ढाई वर्षीय पोती के नाम की कुरिअर डाक प्राप्त की तो वे भौचक्क रह गईं क्योंकि उस डाक में आई 16 पुस्तकों की कीमत कोई 25000 रुपए थी। इतने पैसे में तो उनके दोनों बच्चों की पूरी शिक्षा संपन्न हो गई थी।
लेकिन शुरुआती अचंभा ढल जाने के बाद कामिनी ही अब इन पुस्तकों का इस्तेमाल सबसे ज्यादा करती हैं। 'अपनी पोती के संग इन पुस्तकों के बीहड़ से गुजरने के साथ-साथ मैं अपने ज्ञान में भी वृद्धि करती हूँ। मेरी शादी के वक्त मैं अपने स्कूल का अंतिम वर्ष ही पूरा कर पाई थी।' वे खुलासा करती हैं।
दिनों की पारंपरिक गृहस्थिन अब दुनिया भर को पूरे विश्वास के साथ लाँघ आती हैं। पर उसके लिए यह संक्रमण खूब चुनौतियों भरा रहा होगा, जबकि उसके बच्चों के लिए यह सब एक साधारण सी बात है। जीवन के आठवें दशक में चल रहीं कुसुमलता रॉय इसकी गवाह हैं।
20 साल पहले उनकी बेटी के जुड़वाँ बच्चे होने पर वे कोलकाता से यूएसए के न्यूजर्सी चली गई थीं। पुरानी यादें ताजा करते हुए वे कहती हैं- 'मैं अँगरेजी का एक शब्द भी नहीं बोल सकती थी। यूएसए की तो छोड़ो महानगरीय जीवन कैसा होता है, यह ज्ञान भी मुझे रत्तीभर न था। पर मैंने सब सीखा।
मेरे पहले अनुभवों में से एक अनुभव थोड़े दिनों के लिए भारत वापस आते वक्त रास्ते में, सिंगापुर के एक होटल के अपने कमरे में रूम सर्विस को लेकर था। तब से मैं ये सारी चीजें सीखती गई हूँ। पोते-पोतियों की खातिर सादे बंगाली भोजन से लेकर कॉन्टिनेंटल, चाइनीज और इटालियन खाना बनाना भी मैंने सीखा।' रॉय चहक कर कहती हैं।
ठीक इसी तरह 75 वर्षीय सरोज कुमारी भी अपने पुत्र के बच्चों के प्रति प्यार रखती हैं। साल में दो बार, जब उनका बेटा व उनकी बहू अपने काम से छुट्टी पर होते हैं तो वे अपने पोते-पोती के साथ रहने के लिए दक्षिण भारत से यूके की यात्रा करती हैं। वे जब भी विदेश जाती हैं, अपने साथ एक अदना-सा भारत जरूर ले जाती हैं और वहाँ बच्चों को यहाँ के जीवन की झलकी देती हैं- गाय को चारा वगैरह कैसे खिलाते हैं, घाघरा-चोली कैसे पहनते हैं, यहाँ तक कि भरतनाट्यम कैसे करें, आदि आदि।
'मैं अपने बेटे के परिवार के साथ स्कॉटलैंड, मलेशिया, श्रीलंका वगैरह गई हूँ और अपने पोते-पोतियों को घुमाने भी ले गई हूँ जबकि उनके माँ-बाप अपने व्यावसायिक कामों में भिड़े होते हैं। बदले में, उन लोगों ने मुझे ब्रिटिश लहजे में अँगरेजी बोलना सिखाया।' कहते हुए एक स्मित मुस्कान उनके चेहरे पर निखर आती है।
एक नया आधुनिक पहनावा, नए-नए स्वाद, सफर के लिए हर हमेशा तैयार सूटकेस और दोस्तों का दिन-ब-दिन बढ़ता फैलता दायरा। नए युग की इन दादी-माँओं ने अपने जोश और अपने नन्हे-मुन्नों के लिए अपने प्यार के बूते पीढ़ी-अंतराल को पाट-सा दिया है।

