वृंदावन की विधवाओं ने जीवन में भरा नया प्रकाश

वृंदावन| भाषा| पुनः संशोधित शुक्रवार, 1 नवंबर 2013 (00:24 IST)
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वृंदावन। वृंदावन के मीरासाहा भगिनी आश्रम की एक हजार से अधिक विधवाओं ने गुरुवार की शाम के बाद से पटाखे छोड़कर और दीप जलाकर दीपावली का उत्सव मनाना शुरू कर दिया। गौरतलब है कि इनमें से अधिकतर विधवाओं का स्वास्थ्य कमजोर है और उम्र 70 से अधिक है।

होली मनाने, महाकुंभ में शामिल होने और दशहरा का आनंद उठाने के बाद इन महिलाओं ने अब चार दिनों की दीपावली का जश्न मनाना शुरू कर दिया। एक शताब्दी पुराने इस में आज जलाए गए हजारों दीपों ने न केवल पूरे भवन को जगमग कर दिया बल्कि इन विधवाओं के मनोबल को नई ऊंचाई दी।

अपने परिवारों से तिरस्कृत होकर यहां आईं इन महिलाओं ने यहां रंगीन बल्ब और दीपों से पूरे भवन को सजाया। ऐसा करते समय उनका उत्साह देखते ही बन रहा था। इससे पहले इन महिलाओं ने रंगोली बनाई और इस्कॉन मंदिर के पास खरीदारी करने भी गईं। इन महिलाओं ने दीपावली के उत्सव के लिए अपनी पसंद की शॉल और साड़ियां खरीदीं।

इन महिलाओं को फूलझड़ियों और पटाखों के साथ जश्न मनाते देखना एक दुर्लभ अवसर था। दीपावली के इस जश्न का विचार के संस्थापक ने दिया है।
वृंदावन में स्थित अन्य चार विधवा आश्रमों को भी रंगबिरंगे बल्बों और दीयों से सजाया गया था। सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिन्देश्वर पाठक ने बुजुर्ग हो चुकीं इन महिलाओं के जीवन में खुशहाली लाने के उद्देश्य से 'दीपों के इस त्योहार' के आयोजन का फैसला किया था।

इस पर्व के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम के तहत सभी महिलाएं इस्कॉन मंदिर गईं और अपनी पसंद की साड़ियां और शॉल खरीदीं। पूर्व में स्थापित अनेक मान्यताओं को तोड़ते हुए पाठक ने इन विधवा महिलाओं को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए पिछले एक साल में इन्हें अनेक धार्मिक कार्यों में शामिल कराया है।
आंकड़ों के अनुसार वृंदावन की करीब 85 प्रतिशत विधवाएं पश्चिम बंगाल से हैं। इनमें से ज्यादातर महिलाएं ऐसी हैं, जिनकी शादी बाल्यावस्था में हुई थी और उनके पति का निधन कई दशक पहले हो चुका है। विधवा हो जाने के बाद इन महिलाओं को या तो घर से निकाल दिया गया था या दुर्व्‍यवहार के कारण उन्हें खुद घर छोड़ना पड़ा था। उसके बाद ये महिलाएं वृंदावन पहुंच गईं। (भाषा)



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