आज रागों का कंठ अवरुद्ध है

पंडित भीमसेन जोशी का देवलोकगमन

स्मृति आदित्य| Last Updated: सोमवार, 10 नवंबर 2014 (16:09 IST)
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एक स्वर शांत हुआ और लगा जैसे समूची धरा र नीरवता छा गई। यह खबर दस्तक दे सकती है यह आशंका तो थी मगर मन-मस्तिष्क तैयार नहीं था। संगीत-संसार का वह वटवृक्ष लंबे समय तक मधुर छाँव देता रहा लेकिन एक खबर से साथ ही सारे संगीत प्रेमियों को तपिश में छोड़ गया। आज हमारे पास शेष है बस अलौकिक स्मृतियाँ। किसी सुमधुर संगीत सभा की विशिष्ट अनुभूतियाँ। एक गहरा, बेहद गहरा दिव्य अहसास, जो कभी किसी से व्यक्त नहीं किया जा सकता। शब्दों की असीम संपदा भी जहाँ बेबस और असहाय सी नजर आए वही पंडित भीमसेन जोशी को सुनने का महान अनुभव है।

सौम्य और असाधारण पंडित भीमसेन जोशी की प्रत्यक्ष स्वर बैठक अब हमें कभी नसीब नहीं होगी। यह यथार्थ कितना मर्मांतक है इसे सिर्फ और सिर्फ वही महसूस कर सकता है जिसने उस देव वाणी को प्रत्यक्ष सुना है और आत्मा के अंतिम स्तर तक एक खूबसूरत मीठी झंकार को बहते हुए पहचाना है।

ललित, यमन, भीमपलासी, शुद्ध कल्याण, अभोगी, पूरिया, दरबारी, मालकौंस, तोड़ी जैसे राग पंडित जोशी के कंठ में सजकर सुकोमल हो उठते थे। पंढरी चा वास और माझे माहेर पंढरी जैसे अभंग, ठुमरी या भजन हो चाहे 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' का पवित्र देश राग, पंडित जी का सुस्निग्ध स्वर बिना किसी बाधा और अटकाव के श्रोता के रोम-रोम में प्रविष्ट होता था।
जीवन परिचय: 14 फरवरी, 1922 को कर्नाटक के गडग में जन्मे पंडित भीमसेन जोशी को बचपन से ही संगीत का बहुत शौक था। वह किराना घराने के संस्थापक अब्दुल करीम खान से बहुत प्रभावित थे।

1932 में वह गुरू की तलाश में घर से निकल पडे़। अगले दो वर्षों तक वह बीजापुर, पुणे और ग्वालियर में रहे। उन्होंने ग्वालियर के उस्ताद हाफिज अली खान से संगीत की शिक्षा ली। घर वापसी से पहले वे कोलकाता और पंजाब भी गए।
वर्ष 1936 में पंडित भीमसेन जोशी ने जाने-माने खयाल गायक और अब्दुल करीम खान के शिष्य सवाई गंधर्व, पंडित रामभन कुंडगोलकर से कुंडगोल में गहन शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने सवाई गंधर्व से कई वर्षों तक खयाल गायकी की बारीकियाँ सीखीं थी।

पंडित भीमसेन जोशी ने अपनी विशिष्ट शैली विकसित करके किराना घराने को समृद्ध किया और दूसरे घरानों की विशिष्टताओं को भी अपने गायन में समाहित किया। उन्होंने कई रागों को मिलाकर कलाश्री और ललित भटियार जैसे नए रागों की रचना भी की।
उन्हें खयाल गायन के साथ-साथ ठुमरी और भजन में भी महारत हासिल थी। उन्होंने पहली बार अपने गुरू सवाई गंधर्व के 60वें जन्मदिवस पर जनवरी 1946 में पुणे में पहली बार सार्वजनिक कार्यक्रम पेश किया था। उनके द्वारा गाए गए गीत 'पिया मिलन की आस' 'जो भजे हरि को सदा' और 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' बहुत प्रसिद्ध हुए।

भीमसेन जोशी को पद्मश्री (1972), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1976), पद्म भूषण (1985) और पद्म विभूषण (1999) भारत रत्न ( 2008) जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।
स्मृति शेष : दिव्यतम राग की सुंदरतम परंपरा के जनक पंडित भीमसेन जोशी के जाने से संगीत की सरगम स्तब्ध है।गरिमामयी मंच की रोशनी मद्धिम है और हर कंठ अवरुद्ध है। वेबदुनिया परिवार की विनम्र श्रद्धां‍जलि।



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