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Last Updated : शुक्रवार, 9 जनवरी 2026 (13:19 IST)

IPAC: कैसे काम करता है ममता बनर्जी का सीक्रेट वेपन, जिसे छूने पहुंची ED तो अमित शाह पर भड़की दीदी!

IPAC
पश्चिम बंगाल की राजनीति में IPAC इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आईपैक) को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सबसे शक्तिशाली गुप्त हथियार माना जाता है। प्रशांत किशोर द्वारा स्थापित यह राजनीतिक रणनीति फर्म 2019 से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के साथ जुड़ी हुई है और पार्टी की बड़ी चुनावी जीतों—2021 के विधानसभा तथा 2024 के लोकसभा चुनावों—में इसकी निर्णायक भूमिका रही है। डेटा-आधारित अभियान, नैरेटिव निर्माण, जमीनी फीडबैक और उम्मीदवार चयन तक—आईपैक पर्दे के पीछे से टीएमसी को अजेय बनाती है।

यहां तक कि भाजपा के कुछ नेता निजी बातचीत में स्वीकार करते हैं कि आईपैक अपनी रणनीतियों में बेहद कुशल है। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव से महीनों पहले आईपैक उस समय सुर्खियों में आ गई जब 8 जनवरी 2026 को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कोलकाता के आईपैक ऑफिस और इसके प्रमुख निदेशक प्रतीक जैन के घर पर छापेमारी की। ईडी का दावा है कि कोयला तस्करी के जरिए कमाए गए करोड़ों रुपये हवाला के माध्यम से आईपैक को ट्रांसफर किए गए। इस छापेमारी के दौरान हाई वोल्टेज ड्रामा हुआ—ममता बनर्जी खुद मौके पर पहुंचीं, लैपटॉप, फाइलें और अन्य दस्तावेज लेकर निकलीं।

ममता ने इसे केंद्रीय एजेंसियों की राजनीतिक साजिश और चुनावी रणनीति चोरी करने की कोशिश बताया, जबकि ईडी ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने जांच में बाधा डाली और महत्वपूर्ण सबूत अपने साथ ले गईं। इस विवाद ने बंगाल की सियासत को पूरी तरह गरमा दिया है, जहां आईपैक एक तरफ ममता की जीत की कुंजी बन सकती है, तो दूसरी तरफ विवादों का केंद्र।

पूर्वी कोलकाता की एक ऊंची इमारत की 11वीं मंजिल पर स्थित आईपैक का दफ्तर नीले-सफेद डेस्क से सजा रहता है। यहां 100 से ज्यादा कर्मचारी लैपटॉप पर काम करते हैं और बड़ी टीवी स्क्रीनों पर लगातार खबरें चलती रहती हैं। टेलीग्राफ की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, यह जगह टीएमसी के शस्त्रागार का सबसे घातक हथियार है, जो मुख्यमंत्री के बाद पार्टी की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। आईपैक वही सब करती है जो कभी ममता बनर्जी खुद संभालती थीं—चुनाव अभियान की थीम तय करना, उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग और जरूरत पड़ने पर पार्टी के लिए 'डर्टी वर्क' यानी कठिन व विवादास्पद काम निपटाना।

भाजपा के एक वर्ग की निजी बातचीत में भी यह स्वीकार किया जाता है कि आईपैक अपने काम में माहिर है। ममता सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा, “तृणमूल कांग्रेस भावनाओं और आवेग पर चलती है, लेकिन आईपैक ने इसमें एक मजबूत ढांचा और व्यवस्थित सिस्टम जोड़ दिया है।”प्रशांत किशोर के नेतृत्व में आईपैक की एंट्री 2019 के लोकसभा चुनावों में टीएमसी के खराब प्रदर्शन के बाद हुई।

2021 के विधानसभा चुनाव में 'दुआरे सरकार' और 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाओं के जरिए आईपैक ने ममता की नई छवि गढ़ी, जिसने भाजपा के पूरे नैरेटिव को ध्वस्त कर दिया। प्रशांत किशोर के 2021 में अलग होने के बाद अब संगठन का नेतृत्व तीन निदेशक संभाल रहे हैं—प्रतीक जैन, विनेश चंदेल और ऋषि राज सिंह।

35 वर्षीय प्रतीक जैन टीएमसी और आईपैक के बीच मुख्य कड़ी हैं। सूत्रों के अनुसार, आईपैक की कार्यप्रणाली पूरी तरह डेटा-ड्रिवन है—विधायकों को प्रश्नावली भेजना, बूथ स्तर पर फीडबैक लेना और नेतृत्व को समाधान सुझाना। हालांकि रास्ता आसान नहीं रहा। कई वरिष्ठ टीएमसी नेताओं ने उम्मीदवार चयन में आईपैक के दखल पर नाराजगी जताई है।

अब, जैसे-जैसे 2026 के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, आईपैक एक बार फिर मतदाता सूची संशोधन जैसे मुद्दों पर नैरेटिव सेट करने में जुटी है। बंगाल में ममता से बेहतर कोई नहीं जानता कि चुनाव 'नैरेटिव' से ही जीते जाते हैं—और आईपैक इसी नैरेटिव का सबसे घातक हथियार है। लेकिन ईडी की तलवार लटकने से यह हथियार कितना मजबूत रहेगा, यह आने वाला समय बताएगा।
Edited By: Navin Rangiyal
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