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वैसे भी कवि विनोदकुमार शुक्‍ल की धरती पर लेखक को किसी तरह की अराजकता शोभा नहीं देती

manoj rupda
फोटो : हिंदवी से साभार
कला, साहित्य और कविताओं की दिक्कत यह होती है कि वे बहुत नाज़ुक होती हैं. किसी भी कला को बहुत संवेदनशील माना जाता है. हालांकि यही नाजुकता और संवेदनशीलता कला की ताकत भी है) और इसीलिए आमतौर पर लेखक और कवियों को भी नाज़ुक और संवेदनशील समझ लिया जाता है. उसी वजह से सरकारी कुर्सियों पर बैठे आलोक चक्रवाल जैसे बदमिजाज लोग अपनी नौकरी और पद की बदहवासी में नाजुक मिजाज लोगों से बदतमीजी कर बैठते हैं. लेखक कहानीकार मनोज रुपड़ा जी की जगह मैं वहां होता तो न सिर्फ मंच पर जाकर चक्रवाल को वक्त के पहले वीआरएस देता, बल्‍कि उनके गले में सस्‍ते गेंदे के फूलों की माला पहनाकर घर तक उनकी विदाई भी करता.
मनोज रुपड़ा जी को मैं जानता हूं. हमने जबलपुर में अनिलकुमार फाउंडेशन के साहित्य आयोजन में साथ में शिरकत की थी। होटल से वेन्यू तक जाते हुए उनसे वहां तक छोड़ने वाली कार में मेरी मुलाकातें होती थीं. कार में मेरे बाजू में बैठे हुए वे सिगरेट पीते हुए किसी वॉइड (शून्‍य) में शायद अपनी कहानियों के बारे में और अपने किरदारों के बारे में सोचते रहे होंगे. इसी वजह से मैंने उनकी ख़ामोशी में दखल देकर खलल डालने की कोशिश नहीं की. और उनसे बात नहीं की. कुछ देर की खामोशी के बाद उन्होंने मुझसे ही पूछ लिया— क्या लिखते हैं आप? मैंने कहा कविता. उन्होंने मेरे हाथ में मेरी कविता की पहली किताब देखकर उसे लेते हुए कहा— अरे वाह इसका शीर्षक तो बहुत कमाल है! फिर उन्होंने कहा, लेकिन मैं तो कहानियां लिखता हूं. उनके साथ कुछ और भी बातें हुईं— साथ में विनोद पदरज भी थे. एक बेहद गंभीर चेहरे वाले लेखक को अचानक मुझसे इतना बतियाने हुए मुझे लगा कि मैंने उनके साथ कुछ ज्‍यादा ही एरोगेंसी दिखा दी. पहले मुझे ही उनसे बात कर लेनी चाहिए थी— हालांकि मेरा मकसद उनके शून्य में खलल नहीं डालना था, इसलिए मैं चुप बैठा रहा. बाद में प्रोग्राम के दौरान भी उनसे छिटपुट बातचीत होती रही.

बात यह है कि मनोज रुपड़ा एक बेहद जहीन और अपने में रहने वाले लेखक हैं— जबलपुर में अपना सेशन खत्म होने के बाद वे तुरंत नागपुर के लिए निकल गए. जिस तरह से वे खुद को लेकर बहुत स्पेसिफिक आदमी हैं— मुझे नहीं लगता वे कभी किसी पर कोई तंज या कमेंट करेंगे— यह बात मैं अपने विवेक से उनके बारे में कह सकता हूं.

यहां मनोज जी से मेरी बस एक ही शिकायत है कि वे एक अच्छा मौका चुक गए. मैं उनकी जगह होता तो बताता की कविता/कहानी लिखना अलग बात है और खुद की डिग्निटी को सुरक्षित रखे रखना अलग बात. मैं बताता कि लेखक/ कवि होने का क्या मतलब होता है. हालांकि उन्होंने अच्छा ही किया. वे जिस तरह की तासीर के हैं वे यही कर सकते थे— यही किया भी जाना चाहिए था. एक लेखक को अपना अभुभव लेकर उस जगह से एक्जिट कर जाना चाहिए, जहां उसे यह बेगैरत अनुभव हुआ है. वैसे भी विनोद कुमार शुक्‍ल की धरती पर एक लेखक को किसी भी परिपेक्ष्‍य में किसी तरह की अराजकता शोभा नहीं देती. जिस कुलपति आलोक चक्रवाल की वजह से मनोज जी को यह बुरा अनुभव हुआ उसके ऐवज में अब शेष हिंदी लेखकों की कौम से उम्मीद की जाना चाहिए कि वे इस पर कैसे बर्ताव करती हैं?
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