इतने बहुचर्चित मामले के फैसले पर ऐसी चुप्पी क्यों ?

The Fake Encounter of Sohrabuddin Sheikh
एक समय जो मामला लंबे समय तक सुर्खियों में रहा, उस पर खड़ा करने की कोशिश होती रही और जब उस पर न्यायालय का फैसला आ गया तो कहीं से कोई प्रतिक्रिया भी नहीं। ऐसी स्थिति बनी हुई है मानो इस मामले में किसी की कोई अभिरुचि थी ही नहीं। सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामला को याद करिए। किस तरह राजनीतिक पार्टियां, सक्रियतावादी और मीडिया के एक वर्ग ने इस पर तूफान खड़ा करते हुए केवल और राजस्थान के कुछ पुलिस अधिकारियों को ही नहीं गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं को खलनायक बना दिया था। 2007 के आम चुनाव में सोहराबुद्दीन शेख मामला एक बड़ा चुनावी मुद्दा था।

मुख्यमंत्री के रुप में नरेन्द्र मोदी ने इसका करारा राजनीतिक जवाब देते हुए लोगों को अपने पक्ष में आलोड़ित किया और उनकी विजय में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। अब के विशेष न्यायालय ने शेष बचे सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया है। अपने फैसले में न्यायालय ने कहा कि गवाह और सबूत साजिश और हत्या को साबित करने के लिए काफी नहीं थे। यूपीए शासनकाल में गुजरात दंगों के साथ जिन मामलों में नरेन्द्र मोदी को कानूनी रुप से शिकंजे में लाने की सबसे ज्यादा कोशिश हुई उसमें इशरत जहां तथा सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामला प्रमुख था। दोनों को बताया गया और उसी आधार पर मुकदमा चलाया गया लेकिन दोनों न्यायालय में नहीं टिक सके। तो इसे क्या कहा जाए?

2010 में इस मामले को से लेकर सीबीआई को सौंपा गया था। उच्चतम न्यायालय में मामले को बाहर ले जाने की याचिका भी डाली गई। पूरा मामला उच्चतम न्यायालय की मौनिटरिंग में चला है। सीबीआई ने आरोप पत्र में यह तो बताया था कि का आतंकवादियों के साथ संबंध था। लेकिन उसकी मृत्यु के बारे में सीबीआई का कहना था कि गुजरात एवं राजस्थान सरकार की साजिश के तहत पुलिसकर्मियों द्वारा गोली मारकर मुठभेड़ का रुप दे दिया गया।

इसके अनुसार सोहराबुद्दीन, उसकी पत्नी कौसर बी और उसके सहयोगी प्रजापति को गुजरात पुलिस ने एक बस से उस वक्त अगवा कर लिया था, जब वे 22 और 23 नवंबर 2005 की रात में हैदराबाद से महाराष्ट्र के सांगली जा रहे थे। सीबीआई के अनुसार 26 नवंबर, 2005 को अहमदाबाद के पास शेख की हत्या कर दी गई थी। उसकी पत्नी की तीन दिन बाद हत्या कर उसका शव ठिकाने लगा दिया गया।


उसके एक साल बाद 27 दिसंबर, 2006 को प्रजापति की गुजरात और राजस्थान पुलिस ने गुजरात- राजस्थान सीमा के पास चापरी में गोली मार कर हत्या कर दी, क्योंकि वह इस मामले का चश्मदीद था। सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति को देश के सामने ऐसे पेश किया गया मानो वे निर्दोष हों और अकारण पुलिस ने उनकी जघन्य हत्या कर दी। सोहराबुद्दीन एक अपराधी था जिसका तंत्र मध्यप्रदेश से लेकर राजस्थान एवं गुजरात तक फैला हुआ था। सीबीआई का यह भी कहना था कि गुजरात के पुलिस अधिकारी व्यापारियों से उगाही के लिए सोहराबुद्दीन का इस्तेमाल करते थे। व्यापारी वर्ग भी उससे जान छुड़ाना चाहते थे इसलिए उसकी हत्या के लिए वे पूरा खर्च करने को तैयार थे। तुलसीराम प्रजापति भी उज्जैन का ही रहने वाला था और बड़ा अपराधी था।

तो दोनों अपराधी थे और सोहराबुद्दीन का आतंक व्यापारियों पर था यह सच सभी मानते हैं। किंतु मुख्य बात यह कि क्या वाकई मुठभेड़ में सोहराबुद्दीन की हत्या हुई या उसे पकड़कर मार डाला गया? कोई अपराधी है तो उसे सजा देने के लिए न्यायालय है। पुलिस की भूमिका अपराधी को पकड़कर न्यायालय के हवाले करना तथा उससे संबधित सारे साक्ष्य एवं गवाह प्रस्तुत करना है ताकि उसका अपराध साबित हो सके। न्यायालय के फैसले के बाद यह कहना संभव नहीं है कि दो राज्यों की पुलिस ने अपने राजनीतिक नेतृत्व की जानकारी में इनकी हत्या कर दी।

इस मामले के आरोपियों में 21 गुजरात और राजस्थान पुलिस के कनिष्ठ स्तर के कर्मी तथा 22वां आरोपी गुजरात के फार्म हाउस का मालिक था। आरोप था कि उसी फार्म हाउस में हत्या किए जाने से पहले शेख और कौसर बी को रखा गया था। ध्यान रखिए, सीबीआई ने आरोपपत्र में 38 लोगों को नामजद किया था। इनमें से 16 को सबूत के अभाव में पहले ही आरोपमुक्त कर दिया गया था। इनमें अमित शाह, राजस्थान के तत्कालीन गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया, गुजरात पुलिस के पूर्व प्रमुख पीसी पांडे और गुजरात पुलिस के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी डीजी वंजारा, अभय चूड़ास्मा, गीता जौहरी, राजकुमार पांडियन, एनके अमीन, राजस्थान कैडर के आईपीएस अधिकारी दिनेश एमएन और राजस्थान पुलिस के कॉन्स्टेबल दलपत सिंह राठौड़ शामिल हैं। इसके विरुद्ध सीबीआई गई। उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।

अगर उच्च न्यायालय ने भी फैसले को सही माना तो फिर हमारे-आपके पास कहने के लिए क्या रह जाता है। विशेष न्यायालय फैसले में साफ कह रहा है कि साजिश और हत्या साबित करने के लिए मौजूद सभी गवाह और प्रमाण तो संतोषजनक नहीं ही हैं परिस्थिति संबंधी साक्ष्य भी पर्याप्त नहीं है। उसने यहां तक कह दिया है कि सोहराबुद्दीन शेख-तुलसीराम प्रजापति की हत्या एक साजिश के तहत हुई, यह बात सच नहीं है। वैसे यह सामान्य बात नहीं है कि मुकदमे के दौरान 92 गवाह मुकर गए। कुल 210 गवाह पेश किए गए थे। इनमें से कुछ ने तो सीबीआई पर ही आरोप लगाया कि उन्हें बयान देने के लिए मजबूर किया गया था।

न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष एक भी संतोषजनक सबूत नहीं ला पाया। जब 16 आरोपियों को न्यायालय ने बरी किया तो सोहराबुद्दीन के भाई रूबबुद्दीन ने भी बॉम्बे उच्च न्यायालय में इसके विरुद्ध याचिका दायर की। उच्च न्यायालय ने इस याचिका को भी खारिज कर दिया। इस मामले में आरंभ से ही तूफान खड़ा करने वाले इस याचिका के पीछे थे। इनके वकीलों की कोई दलील न्यायालय को प्रभावित नहीं कर सकी। उसके बाद बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन की ओर से उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई। इस याचिका में अमित शाह को आरोप मुक्त किये जाने को चुनौती नहीं देने के सीबीआई के फैसले पर सवाल उठाया गया था। न्यायालय में खूब बहस हुई। किंतु पिछले 2 नवंबर को बॉम्बे उच्च न्यायालय ने जनहित याचिका को भी खारिज कर दिया।


इन सबका उल्लेख यहां इसलिए जरुरी है ताकि यह साफ हो जाए कि इस मामले में जितना संभव था कानूनी लड़ाई लड़ी गई। नामी वकीलों ने अपना पूरा कौशल लगाया। आखिर 2014 के 16 मई तक तो यूपीए की ही सरकार थी। उनके पास पूरा समय था। इन सबके बावजूद मामले की यह कानूनी परिणति है। आप यह नहीं कह सकते कि इसे ठीक से लड़ा नहीं गया। चूंकि इसमें अमित शाह आरोपी थे, इसलिए भी देश की रुचि थी। न्यायालय के वर्तमान कानूनी परिणति के बाद यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अमित शाह को लंबा समय जेल में गुजारना पड़ा उसका जिम्मेवार किसे कहा जाए?


जिन पुलिस अधिकारियों एवं कर्मियों को जेल की हवा खानी पड़ी उसकी भरपाई कौन करेगा? डीजी वंजारा को अपने राज्य के बाहर के जेल में पूरे नौ वर्ष काटने पड़े। बंजारा कह रहे हैं कि आज यह साबित हो गया कि मैं और मेरी टीम सही थी। हम सच के साथ खड़े थे। उन्होंने न्यायालय को भी यही बताया था कि कि अगर सोहराबुद्दीन नहीं मारा जाता तो नरेन्द्र मोदी की हत्या कर देता। हत्या करता या नहीं यह कहना कठिन है लेकिन जो सा़क्ष्य गुजरात पुलिस ने रखे उससे साफ है कि हत्या करने की साजिश में वह था तथा इसकी कोशिश अवश्य करता।

ऐसे मामले लगातार सामने आते हैं जिनमें पुलिस सीधे हत्या करके उसे मुठभेड़ का चरित्र देती है। यह बिल्कुल गलत है। किंतु ऐसे हर मुठभेड़ को फर्जी मान लेना भी ठीक नहीं। दूसरे, यदि मुठभेड़ के फर्जी होने के संकेत हों तो उसके पीछे राजनीतिक नेतृत्व का हाथ बता देना भी उचित नहीं। मुख्यमंत्री, गृहमंत्री को अपराधी बताने के चक्कर में मामले की पूरी छानबीन तथा कानूनी प्रक्रिया दूसरी दिशा में चली जाती है। साफ दिख रहा है कि इस मामले में मोदी एवं शाह को अपराधी साबित करने के लिए जांच का फोकस बदल गया। इसमें कुछ भी साबित नहीं हो सका। यह दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है।

 

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