सफलता के लिए संशय को दूर भगाएं

Author सुनील चौरसिया| पुनः संशोधित शनिवार, 17 अगस्त 2019 (20:37 IST)
से भरा मनुष्य हमेशा ‘हां’ और ‘ना’ के बीच झूलता रहता है। वह निर्णय नहीं ले पाता है कि अमुक कार्य को करे अथवा ना करे। इस तरह का मनुष्य प्रत्येक कार्य में उचित-अनुचित, लाभ-हानि के विषय में सोचता रहता है। वह हमेशा चिंतित रहता है कि ‘यह किया तो कहीं वह न हो जाए और वह किया तो कहीं यह न हो जाए।' ऐसे में वह सफलता से हमेशा दूर ही रहता है।
संशय से ही असफलता का जन्म होता है। इस प्रकार के लोग सदा यही सोचते रहते हैं कि अभी ऐसा करने से कोई लाभ नहीं है, हो सकता है भविष्य में कोई और अच्छा अवसर प्राप्त हो जाए। अमुक व्यक्ति ने यह कार्य किया था, उसको सफलता नहीं मिली। इस प्रकार का संशय मन में जमा लेते हैं और उनको वर्तमान अवसर भी अनुपयुक्त लगने लगते हैं।
किसी कार्य के दौरान मन में संशय स्वाभाविक है, परन्तु उस संशय को मन में आश्रय देना अहितकारी है। इसके कारण मनुष्य में कार्य करने की क्षमता क्षीण हो जाती है और बनता हुआ काम भी बिगड़ जाता है। मनुष्य जिन श्रेष्ठ कामों को कर सकता है, उनको यह संशय उसके हाथों से छुड़ा देता है।
यदि मनुष्य में दृढ़ इच्छाशक्ति एवं आत्मविश्वास है तो वह संशय पर काबू पा सकता है। इसके लिए उसे अपने मन में यह धारणा बनानी होती है कि वह जो कार्य कर रहा है, उसे पूरा करने का सामर्थ्य उसमें है और वह इसे बखूबी कर सकता है।

यदि आप सोचें कि अमुक कार्य आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इससे आपका नाम होगा, आपको लाभ पहुंचेगा, आपको यश की प्राप्ति होगी तो आपका साहस बढ़ेगा, आप में स्फूर्ति और ताजगी आएगी, आपका मन प्रफुल्लित होगा और आप पूरे तन-मन से उस कार्य को पूरा करने में जुट जाएंगे। परिणामस्वरूप आपके हाथ सिर्फ और सिर्फ सफलता ही आएगी।
संशयी वृत्ति के लोग कार्य करने की अपेक्षा फल की अधिक आशा करते हैं। जब पूरे तन-मन से कार्य किया ही नहीं तो अच्छा फल कहां से मिलेगा। मान लीजिए, आपने अपने बगीचे में एक पौधा रोप दिया और उस पौधे के बारे में कभी सोचा ही नहीं कि उसे समय-समय पर पानी और खाद देना है एवं उसकी देखभाल भी करनी है। इस तरह वह पौधा बड़ा तो होगा, लेकिन यदि आप उसे पर्याप्त खाद-पानी देते और उचित देखभाल करते तो वह और जल्दी बड़ा हो जाता।
कहने का तात्पर्य यह है कि जो काम अधूरे मन किया जाता है, वह उपयुक्त फल नहीं देता। अगर कोई काम करना है तो पूरे तन-मन के साथ कीजिए अन्यथा आधे-अधूरे मन से किए गए काम से पूरे परिणाम की आशा मत कीजिए। प्राय: देखा गया है कि अधूरे मन से किया गया कार्य कभी भी सफल नहीं हो पाता है और परिणामस्वरूप मनुष्य में निराशा का भाव उत्पन्न हो जाता है। निराशा से किए गए कार्य में असफलता ही प्राप्त होती है। फिर मनुष्य अन्य कार्यों को करने से भी कतराने लग जाता है।
जो व्यक्ति आत्मविश्वासी होते हैं, उन पर संशय का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। आत्मविश्वासी व्यक्ति में साहस कूट-कूटकर भरा होता है और साहसी व्यक्ति में निराशा पनप नहीं पाती है। इसलिए हमें न तो संशयी वृत्ति का होना चाहिए और न ही अपने मन में निराशा को जगह देना चाहिए। जो भी काम करें वह पूरे तन-मन से करें, तभी आपको सफलता प्राप्त हो पाएगी।

अरस्तु ने ठीक ही कहा है कि जिस कार्य को आरंभ करो, उसके लिए अपनी योग्यता या अपनी शक्ति-सामर्थ्य के बारे में आशंकित मत हो। रचनात्मक प्रवृत्ति बनाओ, सफलता का विश्वास रखो और विजय पर भरोसा करो। हीनभावना को कभी भी अपने आसपास मत फटकने दो, खुद में आत्मविश्वास जगाओ तथा अपनी सफलता की ही भविष्यवाणी करो। इस प्रकार असफलता आपसे हमेशा दूर रहेगी। संशय एक नकारात्मक भाव है। इसलिए जब तक नकारात्मक भाव को नहीं छोड़ा जाता, तब तक आशा का दीपक प्रज्ज्वलित हो ही नहीं सकता।
कुल मिलाकर यदि कहा जाए कि संशय असफलता की जननी है, तो गलत नहीं होगा। इससे बचकर जहां मानसिक व शारीरिक सुख प्राप्त किया जा सकता है, वहीं असफलता को सफलता में भी बदला जा सकता है। यदि में दिल में सकारात्मक भाव, उत्साह और आत्मविश्वास है तो सफलता हमेशा आपका आलिंगन करेगी।

 

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