sundarkand

इस साल 'प्राकृतिक खबरों की बरसात' न होती तो 'मीडिया' इस वक्त क्या दिखाता?

Updated: शनिवार, 10 अक्टूबर 2020 (12:49 IST)
पिछले करीब आधे साल से मीडिया खबरों से लबालब है। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि कौनसी खबर दिखाएं और कौनसी छोड़ें।

शुरुआत होती है सीएए और एनआरसी के विरोध के बाद शुरू हुए शाहीन बाग़ से। इसके बाद दिल्ली में दंगे हो गए। ठीक इसके बाद कोरोना की शुरुआत हो गई थी। कोरोना की भयावहता के बीच लंबे समय तक तब्लीगी जमात की नौटंकी चली। इसमें मजदूरों का पलायन भी देशभर ने न्यूज़ चैनलों के माध्यम से देखा।

मीडिया के पास शाहीन बाग़, कोरोना और तब्लीगी जमात,मजदूरों का पलायन जैसी खबरों का ओवरफ्लो था। इसी बीच मीडिया को उत्तर प्रदेश के गैंगस्टर विकास दुबे के साथ पुलिस की मुठभेड़ मिल गई। यह सनसनी लंबे समय तक चली। इसका अंत भी फिल्मी स्टाइल में हुआ। विकास दुबे की उज्जैन से गिरफ्तारी, गाड़ी पलटने और एनकाउंटर की फिल्मी कहानी ने देशभर में सनसनी फैला दी और सुर्खियां बटोरीं।

इसी साल दिल्ली की निर्भया के गैंग रेप के चार आरोपियों को फांसी की सज़ा की खबर मीडिया की झोली में आ गिरी थी।

यह सब जब खत्म हो गया और सुस्त पड़ गया तो मीडिया को समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या खबरें दिखाई जाएं?

कोरोना में मरीज़ों और मौत के आंकड़ों ने न्यूज़ एंकर और विव्यूअर्स को भी उदासीन और बोर कर दिया। ऐसे में मीडिया के दोनों हाथ खाली हो गए थे।

ठीक इसी दौरान सुशांत सिंह राजपूत की मौत एक वरदान की तरह मीडिया के आंगन में आ गिरी। उसके बाद से हत्या, आत्महत्या, ड्रग, नेपोटिज़्म और रिया चक्रवर्ती से लेकर कंगना रनोत, संजय राउत, पायल घोष, अनुराग कश्यप, जया बच्चन तक यह सिलसिला चला। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर मानों खबरों की बरसात हो गई।

हाल ही में बाबरी ढांचा गिराए जाने के मामले में फैसला भी था। जिसे लेकर बहस और विमर्श जारी था। चीन के साथ भारत की तनातनी इन सब खबरों के बीच कहीं न धीमे धीमे रेंगती रहती है।

इस वक्त हाथरस का तथाकथित गैंगरेप मीडिया में ट्रेंड कर रहा है। इसमें राजनीति, दंगों की साज़िश और नेताओं की बयानबाज़ी का तड़का है।

इसमें गौर करने वाली बात यह है कि एक खबर आती है तो पहले वाली या तो हट जाती है या हासिये पर चली जाती है।

इसमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश दुनिया की यह सारी खबरें मीडिया की झोली में किसी नैमत या आशीर्वाद की तरह आती गिरती रही। यानी यह सारी खबरें वो सारी घटनाएं थीं जिन्हें मीडिया ने उठाया और कई कई दिनों तक उसे हमारे टीवी स्क्रीन पर परोसा।

इनमें से एक भी खबर ऐसी नहीं थी जिसे मीडिया ने खोजा हो, या डेवेलोप किया हो। यह सब घटनाएं और इवेंट थे जो दुनिया या देश मे कहीं न कहीं घट रहे थे। जिन्हें मीडिया उठाता रहा और दिखाता रहा। कोई ऐसी खबर नहीं थी जिसमें मीडिया ने उजागर किया हो। ये सारी खबरें शासन- प्रशासन या किसी न किसी पक्ष की तरफ से मीडिया को मिल रही थी।

इन खबरों में मीडिया की कोई बड़ी भूमिका नहीं थी, उसकी भूमिका यह थी कि मीडिया उन खबरों को फैला रहा था।

इनके अलावा ऐसी बहुत सी खबरें थी जिनके बारे में मीडिया दिखा सकता था। उनका खुलासा कर सकता था। स्टिंग कर सकता था। चाहे वो बेरोजगारी की बात हो, महंगाई की बात हो, कोरोना के बाद उद्योग धंधे बंद होने की बात हो। दुनिया मे न्यू नार्मल की बात हो, देश मे विकास की बात हो। किसान आंदोलन हो या कोरोना की वैक्सीन की बात हो।

कोरोना के बारे में तो विव्यूअर्स जानना चाहते हैं। इसकी वैक्सीन को लेकर लोग जानना चाहते हैं। लेकिन इन विषयों को लेकर खबरें नदारद हैं।

कुल मिलाकर मीडिया ने वही खबरें परोसी जिनसे उनकी टीआरपी का ग्राफ़ ऊपर उठता है, जिनसे सनसनी फैलती है। इन खबरों में भी मीडिया का अपना कोई योगदान या भूमिका नहीं थी, यह सब घटनाएं थी जिन्हें मीडिया ने अपनी खबरें बनाया और बताया। इन खबरों को दिखाने में जितना सर्कस हो सकता था किया गया, यहां तक कि एक दूसरे को नीचा दिखाने और खबरों को अपना खुलासा बताने का भी कोई मौका नहीं छोड़ा गया। पहले सुशांत सिंह मामला और हाथरस मामला इसका उदाहरण है।

सवाल उठता है कि दुनिया में यह सारी घटनाएं न घटती तो मीडिया के पास अपना दिखाने के लिए क्या होता?  इस बात को इस तरह समझा जा सकता है कि जब कोई घटना नहीं होती है तो उनके पास खबरों का अकाल पड़ जाता है।

शायद यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि अगर देश दुनिया में प्राकृतिक खबरों की बरसात न हो तो मीडिया अपने बल पर क्या दिखाएगा?

नोट: इस लेख में व्‍यक्‍त व‍िचार लेखक की न‍िजी अभिव्‍यक्‍त‍ि है। वेबदुन‍िया का इससे कोई संबंध नहीं है।
लेखक के बारे में
नवीन रांगियाल
नवीन रांगियाल DAVV Indore से जर्नलिज्‍म में मास्‍टर हैं। वे इंदौर, भोपाल, मुंबई, नागपुर और देवास आदि शहरों में दैनिक भास्‍कर, नईदुनिया, लोकमत और प्रजातंत्र जैसे राष्‍ट्रीय अखबारों में काम कर चुके हैं। करीब 15 साल प्रिंट मीडिया में काम करते हुए उन्‍हें फिल्‍ड रिपोर्टिंग का अच्‍छा-खासा अनुभव है। उन्‍होंने अखबार.... और पढ़ें

Show comments

सभी देखें

मच्छर के काटने से खुजली क्यों होती है? जानें वैज्ञानिक कारण और उपचार

Health Tips: बॉड़ी में शुगर कम होने पर क्या-क्या परेशानियां होती हैं, जानें काम की बातें

हाथों और आंखों में छिपे हैं लिवर की बीमारी के संकेत! भूलकर भी न करें इन्हें नजरअंदाज

बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

समय रहते अगर हो जाए लक्षणों की पहचान, तो कैंसर जैसे रोगों का उपचार भी संभव

सभी देखें

कांवड़ यात्रा : ‘बोल बम’ का सनातन संदेश

भारत की विभिन्नताओं में समाहित है अटूट अभिन्नता!

स्पेन में मोरक्को से घुसपैठ, यूरोपीय संघ में मचा हड़कंप

दादाजी की याद में पोती की पाती, पढ़कर आंखें भी नम होगी, उर्जा भी मिलेगी

क्यों मनाया जाता है विश्व आदिवासी दिवस? जानिए इतिहास और इसका महत्व

अगला लेख