परिंदे नहीं जानते कि उनकी मौत किसी सरकारी फाइल में दर्ज नहीं होगी
जब सूरज बुझकर मद्धम होने लगता है— जब दिन की उजली- उजली सी तस्वीर अपना चेहरा बदलती है. जब शाम अपने ऊपर उदास और मायूस पैरहन पहनकर आती है और मरने वाले घर की छत पर सहमा हुआ चांद धीमे- धीमे मंडराता है— तो मन एक पड़ताल करता- सा सुनाई देता है कि जिस घर में एक मौत हुई है उस एक मौत के पीछे कितनी मौतें हो चुकी है. उस हादसे की तह में कितनी अ-दर्ज मौतें दर्ज हैं.
आमतौर पर हम किसी हादसे में सिर्फ उतनी ही मौतें देखते हैं जो मौत की सरकारी फाइल में दर्ज की जाती है. सिर्फ वही सरकारी आंकड़ा देखते हैं, जो पुलिस की फाइल में दर्ज किया जाता है. लेकिन हादसों की तह में— उसके अंधेरे में कितने लोग फनाह हो गए— कितने तन्हा रह गए— कौन जाने?
तारिक़ नईम का शेर याद आ रहा है—
अजीब दर्द का रिश्ता था सब के सब रोए
शजर गिरा तो परिंदे तमाम शब रोए
मैं चाहता हूं कि मेरी रूह किसी परिंदे को— किसी चिडिया को सौंप दी जाए— मुझे इंसान के जिस्म का एतबार नहीं रहा.
इंदौर के ब्रजेश्वरी एनेक्स में रहने वाले पुगलिया परिवार के घर में हुए इलेक्ट्रिक कार हादसे में 8 लोगों की बेहद दर्दनाक मौत हो गई. बच्चे मरे. औरतें मरीं. बुजुर्ग मरे. आंकड़ा हुआ 8 का। एक आशियाना उजड़ा. उसके परे जाकर देखा तो एक और आशियाना उजड़ा हुआ मिला— जो किसी ने नहीं देखा. पुगलिया परिवार के घर की छत पर बसाया गया बेजुबान पक्षियों का आशियाना. घर के ग्राउंड फ्लोर और पहली मंजिल पर आग की कालिख गवाही दे रही थी कि यहां आठ इंसानों की जिंदगी स्वाहा हो चुकी है, लेकिन इस आग की आंच घर के टेरेस तक पहुंची जहां पुगलिया परिवार शायद परिंदों को दाना-पानी देते थे. जहां टेरेस पर तमाम रंगों की चिड़िया, तोते, कबूतर और अनजान परिंदे चहक रहे थे कि रो रहे थे— कौन जाने?
18 मार्च की तारीख में एक तरफ घर के नीचे पुलिस और पत्रकारों की इस बात पर पड़ताल चल रही थी कि कैसे आग में झुलस कर 8 मौतें हो गईं. वहीं दूसरी तरफ छत पर ये परिंदे अपने लिए दाना- पानी का इंतजार कर रहे थे. आग की लपटों से उठे धुएं और कालिख से वे अंदाजा लगा पा रहे थे कि उन्हें दाना देने वाले रहनुमा शायद अब नहीं रहे. ये लपटें उनके आशियानों तक भी पहुंची. उन गमलों तक गई जहां वे तपती गर्मी में ठंडक खोजते होंगे. वहां तक भी गई जहां उनके घोंसले थे और उन फूलों तक भी ये लपट गईं जो उनके आशियाने को अब तक सजाते रहे हैं. लेकिन इस हादसे ने न सिर्फ उनके रहनुमाओं की जिंदगी खत्म कर दी, बल्कि उनके लाल और गुलाबी फूलों का रंग बदलकर उन्हें भी स्याह कर दिया.
इस पत्रकार को जो जिंदगी और मौत के फेरे करता रहता है— उसे ये दर्द तो साल ही रहा है कि एक रात इस घर के 8 लोग अपनी मौत से अनजान नींद की गोद में इस उम्मीद में गए थे कि सुबह उठेंगे तो एक नया उजला दिन उनका इस्तकबाल करेगा, लेकिन एक हादसे ने नींद में ही उन्हें मौत की अनजान नींद में सुला दिया. लेकिन इसी के बरअक्स इसे ये भी दर्द सता रहा है कि इस मनहूस घर के सबसे ऊपर आसमान के ठीक नीचे इन परिंदों के भी आशियाने इस कदर उजड़े हैं कि तमाम शजर दिनभर रोते रहे। रात में भी रोएंगे— कौन जाने?
इन परिंदों को नहीं समझ आ रहा है कि आखिर उनके रहबर के घर के सामने इस गली में इंसानों की ये भीड़ क्यों लगी है. ये कैमरे— ये लाइटें क्यों चमक रही हैं— ये तमाम सायरन क्यों बज रहे हैं. वे तो सिर्फ यही जानते हैं कि सुबह हो गई है और कोई छत पर उनके लिए दाना-पानी लेकर आएगा. वे नहीं जानते कि आग क्या होती है— वे नहीं जानते कि लपट क्या होती है— वे नहीं जानते कि मौत क्या होती है— वे नहीं जानते कि किसी सरकारी फाइल में न तो उनकी जिंदगी दर्ज होती है और न ही उनकी मौत.
परिंदे नहीं जानते कि जो इंसान पेड़ की पेड़ काट देते हैं वो उनके आशियानों की क्योंकर फिक्र करेंगे?