जिंदगी रोजमर्रा की तरह किंतु थोड़ी सावधानी से चल पड़ी है। कुछ दिनों बाद सबकुछ भूल-भालकर दौड़ पड़ेगी एक और नए हादसे के इंतजार में...। आखिर हम हादसों के आतिथ्य में क्यों लगे रहते हैं। हमारी लापरवाही, हमारा भ्रष्टाचार, हमारा लोभ... हमारा ही तो नुकसान है, क्या ये हम...