अनुच्छेद 370 लागू करना संवैधानिक था या हटाना असंवैधानिक है?

history of Kashmir
कुछ पार्टियों के कुछ नेता अनुच्छेद 370 हटाने को असंवैधानिक कह रहे हैं। वे कह रहे हैं कि करना ही था तो कश्मीरियों को विश्वास में लेकर करना था। यदि ऐसा है तो हमें और भी कई सवाल पूछने होंगे।

कुछ सवाल:-
सबसे बड़ा सवाल यह है कि किस के तहत 1947 में भारत का विभाजन किया गया था? क्या विभाजन असंवैधानिक नहीं था? क्या विभाजन के समय बहुमत की राय ली गई थी? क्यों हिन्दू बहुल सिन्ध को पाकिस्तान में शामिल किया गया? और क्यों सिख बहुल पंजाब का बंटवारा किया गया? पंजाब का बंटवारा करते समय क्या पंजाबी सिखों को विश्वास में लिया गया था? क्या जरूरत थी बंगाल का विभाजन करने की? चलिए ठीक है, जब कर ही लिया कुछ लोगों ने ऊपर बैठकर निर्णय, तो क्यों नहीं उसी वक्त कश्मीर की समस्या सुलझा ली गई?

धारा 370 लगाना क्या संवैधानिक था?
26 अक्टूबर 1947 को जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरिसिंह ने अपनी रियासत के भारत में विलय के लिए विलय-पत्र पर दस्तखत किए थे। गवर्नर जनरल माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर को इसे मंजूरी दी। न इसमें कोई शर्त शुमार थी और न ही रियासत के लिए विशेष दर्जे जैसी कोई मांग। इस वैधानिक दस्तावेज पर दस्तखत होते ही समूचा जम्मू और कश्मीर जिसमें पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला इलाका भी शामिल है, संवैधानिक रूप से भारत का अभिन्न अंग बन गया था। लेकिन फिर क्यों उसे विशेष राज्य का दर्जा देकर धीरे-धीरे उसे भारत से अलग करने की साजिश चली गई?

जब भारत का संविधान बना तब प्रिंसली स्टेट्स और प्रोविजंस दोनों को एक कर उन्हें संविधान के अंतर्गत लिया गया। तब संविधान सभा ने रियासत और राज्य दोनों के ही कानून को मिलाकर एक ही प्रकार के कानून अटैच किए और सभी राजाओं ने इस पर विचार किया और इसे अपनी मंजूरी दे दी। इन स्टेट के संविधान में सभी राजाओं ने लिखा कि मैं, मेरे वंशज और मेरे बाद जो मेरा उत्तराधिकारी और राज्य में आने वाला, शासन करने वाला कोई भी व्यक्ति और यहां की प्रजा वो सभी भारत के संविधान को एडॉप्ट करते हैं और भारत का संविधान यहां लागू होता है। मतलब यह कि अब राजा है तो संविधान के द्वारा राजा है। अगर संविधान उसे राजा नहीं बताता तो वह राजा नहीं है इसलिए अब भारतीय लोकतंत्र में राजा और प्रजा नहीं रहे, प्रजा ही राजा है।

लेकिन 17 अक्टूबर 1949 को संसद में गोपाल स्वामी अयंगर ने खड़े होकर कहा कि हम जम्मू और कश्मीर को नया आर्टिकल देना चाहते हैं। उनसे जब यह पूछा गया कि क्यों? तो वे इस 'क्यों' का अच्छे से जवाब नहीं दे पाए। उन्होंने कहा कि जम्मू और कश्मीर में अभी हालात ठीक नहीं है तो अभी वहां भारतीय संविधान लागू करना संभव नहीं होगा इसलिए अभी अस्थायी तौर पर उसके लिए 370 लागू करना होगी। उल्लेखनीय है कि सबसे कम समय में डिबेट के बाद यह आर्टिकल पार्लियामेंट में पास हो गया। यह संविधान में सबसे आखिरी में जोड़ी गई धारा थी। इस धारा के फेस पर भी लिखा है कि 'टेम्परेरी प्रोविजन फॉर द स्टेट ऑफ द जम्मू और कश्मीर'।

भारतीय संविधान के 21वें भाग का 370 एक अनुच्छेद है। 21वें भाग को बनाया ही गया अस्थायी प्रावधानों के लिए था जिसे कि बाद में हटाया जा सके। इस धारा के 3 खंड हैं। इसके तीसरे खंड में लिखा है कि भारत का राष्ट्रपति जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा के परामर्श से धारा 370 कभी भी खत्म कर सकता है। हालांकि अब तो संविधान सभा रही नहीं, ऐसे में राष्ट्रपति को किसी से परामर्श लेने की जरूरत नहीं।

(इसका एक और पहलू यह है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने पीडीपी से गठबंधन करने के बाद उससे संबंध तोड़ लिया और फिर संसद में जम्मू और कश्मीर के लोगों को आरक्षण बिल देने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से वहां के राज्यपाल को विधानसभा के अधिकार ट्रांसफर किए और बाद में धारा 370 बिल संसद में पेश कर दिया)

सवाल यह उठता है कि उस वक्त तो हैदराबाद और जूनागढ़ सहित पंजाब और बंगाल में भी हालात ठीक नहीं थे? क्या यह धारा जोड़ने के पहले लद्दाख और जम्मू के लोगों से राय ली थी? इस तरह जल्दबाजी में संविधान में यह धारा जोड़ देना बगैर उचित बहस के क्या यह असंवैधानिक नहीं था? और, जब यह धारा अस्थायी थी तो 70 साल में क्यों नहीं हटाई गई?


उस वक्त के तात्कालिक शासक को यह धारा हटाना थी लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं करके 'दिल्ली एग्रीमेंट' के तहत राज्य के राजा के सभी अधिकार छीनकर वहां पर एक प्रधानमंत्री बना दिया। मतलब यह कि इसी धारा को आगे बढ़ाया गया।

'दिल्ली एग्रीमेंट' सन् 1952 में शेख अब्दुल्ला और भारत के प्रधानमंत्री नेहरू के बीच हुआ था। सन् 1952 के 'दिल्ली एग्रीमेंट' के बाद ही 1954 का विवादित कानून 'अनुच्छेद 35A' जोड़ा गया। ज्ञातव्य है कि इस अनुच्छेद के बाद ही जम्मू और कश्मीर का संविधान 1956 में बनाया गया। 1954 में प्रेसीडेंट ऑफ इंडिया की ओर से एक आदेश पारित किया गया। उस आदेश के तहत जम्मू और कश्मीर राज्य में भारतीय संविधान के अन्य प्रावधान लागू किए जाने थे लेकिन उन्होंने अलग से राज्य को एक कानूनी आदेश दे दिया। ऐसा आदेश, जो कि संविधान की मूल भावना के खिलाफ था। दरअसल, किसी राष्ट्रपति को संविधान में कोई धारा जोड़ना या नया कानून बनाने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार भारत के दोनों सदनों को है।

लेकिन ऐसा कहते हैं कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू के कहने पर राज्य को विशेष अधिकार देने के लिए एक आदेश पारित कर दिया। यह विशेष अधिकार ही आर्टिकल 35A था। यह ऐसा आर्टिकल है जिसको राष्ट्रपति को बनाने का अधिकार ही नहीं था। राष्ट्रपति के अधिकार में यह था कि जम्मू और कश्मीर राज्य में भारत के संविधान के बचे हुए प्रावधानों को लागू किया जाए। लेकिन राष्ट्रपति ने संविधान के प्रावधानों को लागू करने के बजाय एक नया आर्टिकल बना दिया आर्टिकल 35A जिसे कि देश का सबसे बड़ा 'संवैधानिक फ्रॉड' माना गया। इस आर्टिकल 35A में लिखा है कि जम्मू और कश्मीर विधान मंडल को यह अधिकार प्रदान करता है कि संविधान जम्मू और कश्मीर को राज्य के रूप में विशेष अधिकार देता है।

यह उल्लेखनीय है कि यह आर्टिकल न तो पीएम नेहरू ने कैबिनेट से पास कराया और न ही इसका संविधान में कोई उल्लेख ही था। फिर भी यह आर्टिकल बाद में संविधान में जोड़ दिया गया, जब राज्य को ये अधिकार दे दिए गए तो फिर जम्मू और कश्मीर में राजनीतिज्ञों को अपनी मनमानी करने का एक हथियार मिल गया। इस आधार पर उन्होंने तब अपने राज्य का अपना संविधान बना लिया जिसमें जम्मू और लद्दाख की अनदेखी की गई।

कुछ और सवाल:-
क्या किसी राज्य को उसका खुद का संविधान बनाने, खुद का झंडा अलग बनाने की छूट देना असंवैधानिक नहीं था? क्या 70 साल में आप कश्मीरियों को विश्‍वास में नहीं ले पाए? क्या आपने जम्मू और लद्दाख की आवाज नहीं सुनी? क्या आपको 70 साल से कश्मीरी पंडितों का दर्द नजर नहीं आया? क्या 70 साल से आपको सिर्फ गुलाम नबी आजाद, अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार की ही बात समझ में आती रही? आपने 70 साल तक हुर्रियत को किसके कहने पर छूट दे रखी थी? क्या आपको नहीं पता था कि पाकिस्तान ने ऑपरेशन 'टोपेक' बनाया है? क्या आपको नहीं पता था कि पाकिस्तान कश्मीर में क्या कर रहा है? इन 70 सालों में आपने पीओके की कभी आवाज सुनी या उसे लेने के बारे में कभी पाकिस्तान से चर्चा की?

ऐसे कम से कम 100 सवाल हैं जिसका जवाब कौन देगा?निश्चित ही वही देंगे जिन्होंने इस देश पर सबसे ज्यादा राज किया और जिन्होंने धारा 370 को लागू किया।

 

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