पाकिस्तानी सीरियल 'डंक' के बहाने समाज के 'डंक' को पहचानें


डंक की बात आते ही हमें केवल बिच्छू और मधुमक्खी जैसे जीव ही याद आते हैं। पर इन्हें तो प्रकृति ने आत्म रक्षा के लिए इस अंग से नवाजा है। जहर होता है डंक में, भयानक दर्द भी. पर ये जीव निर्दोष भी हैं।
इनका इलाज भी है। पर हम इंसानों में भी खतरनाक डंकधारी होते हैं। जो केवल ‘डंकते’हैं।
अपने अपने तरीकों से। बेहद जहरीले और लाइलाज।
बिना सोचे समझे की उनके इस दंश से कितने जीवन बर्बाद होंगे, घर वीरान होंगे, दाम्पत्य टूटेंगे, बच्चे सहमेंगे, समाज क्या दुर्गति करेगा। आप सच्चे हैं तो लड़ाई लड़ते रहिए, झूठे हैं तो भी लड़ते रहिए। और सहते रहिए मरने तक इस डंक की चुभन, दर्द और जहर को।
ऐसा भी तो हो सकता है ना कि “कुसूरवार बेकसूर साबित हो जाए और बेकसूर कसूरवार। ”
की मैं जबरदस्त प्रशंसक हूं। खासकर जब से सीरियल ‘डंक’देखना शुरू किया है, और सम्मान बढा है।
कलाकारों के कद्रदान सरहदों की सीमा में बांधे नहीं जा सकते। सच्ची घटना पर आधारित ये ड्रामा झकझोर के रख देता है। खासकर प्रोफेसर हुमायूं (नोमान इजाज )के आत्महत्या के समय। स्टोरी लाइन यूं है कि अमल नाम की स्टूडेंट अपने मंगेतर और चचेरे भाई हैदर के लिए, उसे बिना बताए प्रोफेसर पर ‘सेक्सुअल हेरासमेंट’ का आरोप लगा देती है। प्रोफेसर के खिलाफ जांच कमेटी बैठा दी जाती है।

इस हादसे के पहले प्रोफेसर हुमायूं एक उज्जवल चरित्र, विद्वान्, ईमानदार, समर्पित और युनिवर्सिटी के ज्ञानी, विश्वसनीय बच्चों के भी चहेते रहते हैं। पर सभी अचानक से उन्हें संदिग्ध नजरों से तौलने लगते हैं। इतने वर्षों के समर्पण और प्रतिष्ठा पर सेकेंड्स में कालिख पुत जाती है। और इक्का-दुक्का साथियों व पत्नी व इकलौती बच्ची के आलावा सभी का व्यवहार उनसे
प्रश्न वाचक और स्पष्टीकरण मांगता सा हो गया।
वे अपनी सच्चाई पर डटे रहे, सामाजिक भर्त्सना से जरा नहीं डरे। पर बात जब अपनी नन्ही सी बेटी की आई तब वे हार गए क्योंकि हर पिता अपनी बेटी के लिए हीरो होता है। उस नन्ही के साथ भी समाज क्रूरता से पेश आता है। तब इस झूठे आरोप से विचलित हो आत्महत्या कर लेते हैं।

चूंकि हम इसी पेशे से जुड़े हैं शायद इसलिए भी इस पर लिखना अनिवार्य हो जाता है। हमने भी ऐसे कई सच्चे-झूठे हादसे, घटनाओं, दुर्घटनाओं को देखा है, सुना है और जिया है। आज भी ऐसे लोग हैं जो न केवल शिक्षा जगत में वरन सारी दुनिया में जहां जहां भी स्त्री-पुरुष साथ में हैं इन हथियारों/कर्मों को अंजाम देते हैं या इस्तेमाल करने में जरा नहीं हिचकते। मानवीय स्वभाव अधिकतर चरित्र हनन ही देखना सुनना चाहता है। किसी को भी प्रतिष्ठा से विष्ठा में ला पटकने की कला में मीडिया और समाज की भूमिका का काला सच उजागर करता है। एक झूठ जो शायद कहीं किसी और हादसे में सच भी हुआ होता होगा, कैसे हंसती-खेलती खिलखिलाती पारिवारिक, सामाजिक जिंदगी को बर्बाद कर देता है।

बार बार बजता गीत –

ओ साइयां वे, दुहाईयां वे.

कांटों पे रखे गुलाब क्यों हैं, जख्मी हुए ऐसे ख्वाब क्यों हैं.

किसको सुनाएं अपना हाल रब्बा,

मैं हुण जीना के मर जावां...

मन को शोकग्रस्त करता है। एक सच्चाई जो सुनी नहीं जाती। सभी केवल सोशल मिडिया पर अपने असुरी आनंद को घटिया अभिव्यक्ति से प्रदर्शित करते हैं। बैनर, पोस्टर, मुंह पर स्याही/कालिख पोतना, जुटे, चप्पलों की माला पहनना, फेंक कर मारना, जुलूस निकालना, अभिव्यक्ति की आजादी व अधिकार और न्याय की मांग की आड़ में केवल मनघडंत बेशर्म मनोरंजन परोसना ये कैसा समाज तैयार हो रहा है?

एक प्रोफेसर के जीवन की ये दर्दनाक दास्तां आप, हम सभी पर भी तो बीत सकती है। क्यों नहीं हम ऐसे विषैले इंसानों के डंकों को तोड़ते, इनका इलाज नहीं करते? क्यों हम सफेदी के बजाय कालिख की ओर चल पड़ते हैं? क्यों हम जिंदगियों पर डंक के ग्रहण लगाने का पक्ष लेते हैं? क्यों हम केवल पतन देखना चाहते हैं? ऐसे कई प्रश्न हैं जिनके जवाब नहीं हैं।
यदि नहीं है तो फिर सिर्फ ये -

तन की कालिख धुल जाती है, मन की कालिख कैसे धुले...के हुण जीना के मर जावां....



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