राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू धाम के अधिपति, शीश के दानी भगवान श्री खाटू श्याम जी की महिमा निराली है। महाभारत के बर्बरीक के इस कलयुगी अवतारी देवता की आरती का गायन करना हृदय को असीम शांति से भर देता है। बाबा श्याम की आरती न केवल उनके दिव्य स्वरूप का गुणगान करती है, बल्कि भक्तों के जीवन से अंधकार को मिटाकर खुशियों का संचार करती है। जब मंदिर के पट खुलते हैं और "ॐ जय श्री श्याम हरे" की गूँज उठती है, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। चाहे मंगल आरती हो या शयन आरती, बाबा के चरणों में शीश झुकाने मात्र से भक्तों के बिगड़े काम बन जाते हैं। पढ़िये बाबी की आरती।
1. मकर संक्रांति उत्तरायण का महत्व और अर्थ
सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता है तो वह उत्तरगामी होता है। उसी तरह जब वह कर्क में प्रवेश करता है तो दक्षिणगामी होता है। ऐसा बहुत कम समय रहता है जबकि सूर्य पूर्व से निकलकर दक्षिण होते हुए पाश्चिम में अस्त होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार उत्तरायण के समय सूर्य उत्तर की ओर झुकाव के साथ गति करता है जबकि दक्षिणायन होने पर सूर्य दक्षिण की ओर झुकाव के साथ गति करता है। इसीलिए उत्तरायण और दक्षिणायन कहते हैं। उत्तरायण के समय दिन लंबा और रात छोटी होती है, जबकि दक्षिणायन के समय में रातें लंबी हो जाती हैं और दिन छोटे होने लगते हैं। सूर्य 6 माह उत्तरायण और 6 माह दक्षिणायन रहता है। मकर संक्रांति से देवताओं का दिन आरंभ होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है। दक्षिणायन का काल देवताओं की रात्रि मानी गई है। अर्थात देवताओं के एक दिन और रात को मिलाकर मनुष्य का एक वर्ष होता है। मनुष्यों का एक माह पितरों का एक दिन होता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायन का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि उत्तरायन के 6 मास के शुभ काल में जब सूर्यदेव उत्तरायन होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है, तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यही कारण था कि भीष्म पितामह ने शरीर तब तक नहीं त्यागा था, जब तक कि सूर्य उत्तरायन नहीं हो गया।
उत्तरायण उत्सव, पर्व एवं त्योहार का समय होता है और दक्षिणायन व्रत, साधना एवं ध्यान का समय रहता है। उत्तरायण में तीर्थयात्रा, धामों के दर्शन और उत्सवों का समय होता है। उत्तरायण के 6 महीनों के दौरान नए कार्य जैसे- गृह प्रवेश, यज्ञ, व्रत, अनुष्ठान, विवाह, मुंडन आदि जैसे कार्य करना शुभ माना जाता है। दक्षिणायन में विवाह, मुंडन, उपनयन आदि विशेष शुभ कार्य निषेध माने जाते हैं। इस दौरान व्रत रखना, किसी भी प्रकार की सात्विक या तांत्रिक साधना करना भी फलदायी होती हैं। इस दौरान सेहत का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
कौनसी ऋतुएं होती हैं : उत्तरायण के दौरान तीन ऋतुएं होती है- शिशिर, बसन्त और ग्रीष्म। इस दौरान वर्षा, शरद और हेमंत, ये तीन ऋतुएं होती हैं।
2. मकर संक्रांति उत्तरायण पूजा पाठ विधि
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संक्रांति के दिन पुण्य काल में दान, स्नान व श्राद्ध करना शुभ माना जाता है।
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इस दिन तीर्थों में या गंगा स्नान और दान करने से पुण्य प्राप्ति होती है।
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मकर संक्रांति के दिन पावन नदियों में श्रद्धापूर्वक स्नान करें।
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इसके बाद, पूजा-पाठ, दान और यज्ञ क्रियाओं को करें।
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प्रातःनहा-धोकर भगवान शिव जी की पूजा तेल का दीपक जलाकर करें।
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भोलेनाथ की प्रिय चीजों जैसे धतूरा, आक, बिल्व पत्र इत्यादि को अर्पित करें।
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भविष्यपुराण के अनुसार सूर्य के उत्तरायन या दक्षिणायन के दिन संक्रांति व्रत करना चाहिए।
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इस व्रत में संक्रांति के पहले दिन एक बार भोजन करना चाहिए।
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संक्रांति के दिन तेल तथा तिल मिश्रित जल से स्नान करना चाहिए।
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इसके बाद सूर्य देव की स्तुति करनी चाहिए। ऐसा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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संक्रांति के पुण्य अवसर पर अपने पितरों का ध्यान और उन्हें तर्पण अवश्य प्रदान करना चाहिए।
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सूर्यदेव को अर्घ्य दें। आदित्य हृदय स्तोत्र का 108 बार पाठ करें।
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मकर संक्रांति के शुभ मुहूर्त में सिद्ध सूर्य यंत्र को सूर्य मंत्र का जप करके पहनने से सूर्यदेव तरक्की की राह आसान बना देते हैं।
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तिल युक्त खिचड़ी, रेवड़ी, लड्डू खाएं एवं दूसरों को भी खिलाएं।
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ब्राह्मण को गुड़ व तिल का दान करें और खिचड़ी खिलाएं।
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वेदों में वर्जित कार्य- जैसे दूसरों के बारे में गलत सोचना या बोलना, वृक्षों को काटना और इंद्रिय सुख प्राप्ति के कार्य इत्यादि कदापि नहीं करना चाहिए।
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जरूरतमंद को कंबल, वस्त्र, छाते, जूते-चप्पल इत्यादि का दान करें
मकर संक्रांति मंत्र :
मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव की निम्न मंत्रों से पूजा करनी चाहिए:
- ॐ सूर्याय नम:, ॐ आदित्याय नम:, ॐ सप्तार्चिषे नम:।
- ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रौमं स: सूर्य्याय नमः
3. मकर संक्रांति उत्तरायण सूर्य को अर्घ्य
1. सर्वप्रथम प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व शुद्ध होकर स्नान करें।
2. तत्पश्चात उदित होते सूर्य के समक्ष आसन लगाए।
3. आसन पर खड़े होकर तांबे के पात्र में पवित्र जल लें।
4. उसी जल में मिश्री भी मिलाएं। कहा जाता है कि सूर्य को मीठा जल चढ़ाने से जन्मकुंडली के दूषित मंगल का उपचार होता है।
5. मंगल शुभ हो तब उसकी शुभता में वृद्दि होती है।
6. जैसे ही पूर्व दिशा में सूर्यागमन से पहले नारंगी किरणें प्रस्फूटित होती दिखाई दें, आप दोनों हाथों से तांबे के पात्र को पकड़ कर इस तरह जल चढ़ाएं कि सूर्य जल चढ़ाती धार से दिखाई दें।
7. प्रात:काल का सूर्य कोमल होता है उसे सीधे देखने से आंखों की ज्योति बढ़ती है।
8. सूर्य को जल धीमे-धीमे इस तरह चढ़ाएं कि जलधारा आसन पर आ गिरे ना कि जमीन पर।
9. जमीन पर जलधारा गिरने से जल में समाहित सूर्य-ऊर्जा धरती में चली जाएगी और सूर्य अर्घ्य का संपूर्ण लाभ आप नहीं पा सकेंगे।
10. अर्घ्य देते समय निम्न मंत्र का पाठ करें -
'ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजोराशे जगत्पते।
अनुकंपये माम भक्त्या गृहणार्घ्यं दिवाकर:।।' (11 बार)
11. ' ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय, सहस्त्रकिरणाय।
मनोवांछित फलं देहि देहि स्वाहा: ।।' (3 बार)
12. तत्पश्चात सीधे हाथ की अंजूरी में जल लेकर अपने चारों ओर छिड़कें।
13. अपने स्थान पर ही तीन बार घुम कर परिक्रमा करें।
14. आसन उठाकर उस स्थान को नमन करें।
4. मकर संक्रांति उत्तरायण पर्व पूजा के लाभ
1. तिल, तेल, गुड़, रेवड़ी का दान: इस दिन तिल का दान करने से शनि गुड़ का दान करने से सूर्य का उपाय होता है। इस दिन रेवड़ी का भी दान किया जाता है। यह सूर्य के साथ मंगल का उपाय है। इस दिन तेल दान करना शुभ होता है। यह शनि का उपाय है।
2. कंबल और वस्त्र: इस दिन कंबल का दान करना शुभ होता है। यह राहु और शनि का उपाय है। इस दिन जरूरतमंदों या गरीबों को नए वस्त्र दान करना चाहिए।
3. सीधा: इस दिन किसी पुजारी को गुड़, आटा, घी, नमक, शक्कर आदि सामान दान करना शुभ होता है। इस दिन घी का दान करने से करियर में सफलता मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह शुक्र का उपाय है।
4. अनाज: चावल सहित इस दिन पांच तरह के अनाज दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
5. खिचड़ी: इस दिन खिचड़ी का दान करना शुभ होता है।
6. गाय: इस दिन गाय दान करने का भी महत्व है। इस दिन गाय को हरा चारा खिला शुभ होता है। यह बुध और शुक्र का उपाय है।
5. मकर संक्रांति उत्तरायण के संबंध में पूछे जाने वाले प्रश्न-उत्तर- FAQs
1. मकर संक्रांति क्या है और इसका 'उत्तरायण' से क्या संबंध है?
उत्तर: 'मकर संक्रांति' वह खगोलीय घटना है जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसी दिन से सूर्य की गति उत्तर की ओर होने लगती है, जिसे 'उत्तरायण' कहा जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से उत्तरायण को "देवताओं का दिन" माना जाता है, जिसमें सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ जाता है।
2. उत्तरायण का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व क्या है?
उत्तर: उत्तरायण को अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का प्रतीक माना जाता है।
देवताओं का समय: मान्यताओं के अनुसार उत्तरायण देवताओं का दिन और दक्षिणायन रात्रि होती है।
मोक्ष का द्वार: कहा जाता है कि उत्तरायण में प्राण त्यागने वाली आत्माओं को मोक्ष मिलता है। महाभारत के भीष्म पितामह ने अपने प्राण त्यागने के लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी।
3. इस दिन किन चीजों का दान करना सबसे शुभ माना जाता है?
उत्तर: मकर संक्रांति पर दान का फल अक्षय (कभी न खत्म होने वाला) होता है। विशेष रूप से निम्नलिखित वस्तुओं का दान करें:
तिल और गुड़: शनि और सूर्य की कृपा के लिए।
खिचड़ी: सुख-समृद्धि के लिए (चावल, काली उड़द दाल)।
कंबल और वस्त्र: ठंड से राहत के लिए जरूरतमंदों को दान।
घी और स्वर्ण: आध्यात्मिक उन्नति के लिए।
4. भारत के विभिन्न राज्यों में इसे किन नामों से मनाया जाता है?
उत्तर: मकर संक्रांति पूरे भारत में अलग-अलग नामों से प्रसिद्ध है:
पंजाब और हरियाणा: लोहड़ी (एक दिन पहले)।
तमिलनाडु: पोंगल।
गुजरात और राजस्थान: उत्तरायण (पतंगबाजी का उत्सव)।
असम: माघ बिहू।
उत्तर प्रदेश/बिहार: खिचड़ी।