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थोड़ी खुशी, थोड़ा गम

लोकसभा चुनाव वादा घोषणा जम्मू कश्मीर राजनीति कांग्रेस भाजपा
जम्मू से सुरेश एस डुग्गर
अक्सर चुनावी वादों के बारे में यही कहा जाता है कि वे सिर्फ करने के लिए होते हैं, पूरा करने के लिए नहीं। लेकिन अगर जम्मू-कश्मीर के प्रति कांग्रेस के वादों को देखा जाए उसने थोड़ी खुशी और थोड़ा गम का माहौल इसलिए बनाया है क्योंकि कुछेक वादे तो उसने पूरे कर दिए और कुछेक अधर में लटक गए। जबकि कुछेक के लिए हालात ही ऐसे बन गए कि वह चाह कर भी पूरा नहीं कर सकी।

कश्मीरियों की कई मांगों को उसने अपने पिछले चुनावी घोषणापत्र में शामिल किया था। उसी पर चलते हुए उसने कई मुद्दों को सुलझाने की खातिर राज्य में पांच वर्किंग ग्रुपों का गठन किया था। इन वर्किंग ग्रुपों के गठन की घोषणा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने २६ मई २००६ को श्रीनगर के दौरे के दौरान की थी।

इस पर काम भी हुआ। गठन भी हुआ लेकिन उनकी संस्तुतियों पर अमल नहीं होने के कारण कश्मीर में थोड़ी खुशी और थोड़े गम का माहौल है। इन वर्किंग ग्रुपों को कई काम सौंपे गए थे जिनमें सबसे बड़ा काम राज्य और केंद्र के संबंधों का था तो राज्य के हल के लिए सेल्फ रूल या आटोनोमी में से किसी एक को चुनने का था।

इतना जरूर था कि कांग्रेस की कोशिशों के कारण पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर के साथ न सिर्फ व्यापार शुरू हो पाया बल्कि कारवां-ए-अमन और राहे मिलन जैसी यात्री बसों का परिचालन भी आरंभ हो पाया। आतंकवादियों और अलगाववादियों से आमने-सामने बातचीत कर मसले को सुलझाने की कवायद सिरे नहीं चढ़ पाई। न ही पाकिस्तान के साथ ऐसा माहौल बन पाया क्योंकि मुंबई हमले ने सभी आशाओं पर पानी फेर दिया।

और अब एक बार फिर कश्मीरियों को उम्मीद है कि कश्मीर में शांति बहाली के मुद्दे को कांग्रेस अहमियत देगी। हालांकि राज्य में गठबंधन सरकार की घटक बनने वाली कांग्रेस को नेकां की आटोनोमी की मांग पर भी संतुलन बैठाना है। यह मुद्दा वह कैसे हैंडल करती है इस पर भी सभी की नजर है।