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Written By ND

खुश रहे तू सदा...!

जीवन के रंगमंच से

जीवन के रंगमंच
निर्मला भुराड़िया
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भारत में दो युवाओं के बीच का प्रेम अक्सर कहानी बन जाता है। क्योंकि यहाँ मूलतः अरेंज शादियों का रिवाज है, सो वह छोड़कर कोई प्रेम कर बैठे तो जात-पात, ऊँच-नीच, घरवालों की पसंद-नापसंद जैसी स्थितियाँ प्रेम कहानियों में अड़चन भरे मोड़ लाती हैं। जहाँ समाज आड़े नहीं आता, विलेन आड़े आ जाता है। हिन्दी फिल्मों में अक्सर इस विलेन का रोल हीरोइन के लिए उसके माता-पिता द्वारा पसंद किए गए लड़के को दिया जाता है।

हीरो-हीरोइन गाना गा रहे होते हैं तभी ये मंगेतर विदेश से आ टपकता है और विलेनगिरी करने लगता है। हीरोइन के प्रति एकतरफा प्यार में जलता आदमी अक्सर खलनायक में तब्दील हो जाता है। 'तू मेरी नहीं तो किसी और की भी नहीं हो सकेगी' वाले व्यवहार पर उतर आता है। वह कैसे भी हीरोइन को पाना चाहता है और इसी को प्रेम समझता है। न पा सके तो चेहरे पर तेजाब भी डाल सकता है, लव लेटर ससुराल पहुँचाकर लड़की को ब्लैकमेल कर सकता है।

पिछले दिनों ऐसे एंटी हीरो को नायक बताने वाली फिल्में भी काफी बनीं। जिसमें हीरो अपनी प्रेमिका का मर्डर करके भी दर्शकों की सहानुभूति जीतता है। इन फिल्मों ने दर्शकों की पसंद का ढर्रा खूब बिगाड़ा। मगर 'अजब प्रेम की गजब कहानी' का हीरो एक अलग ही थ्योरी लेकर आया है। वह हीरोइन को पाना तो चाहता है, मगर न पा सके तो फिर ईष्यालु और कुंठित होकर अपने प्रिय पात्र को सताना भी नहीं चाहता। नायिका उसकी न हो सके तब भी वह उसे प्रसन्नता का उपहार देना चाहता है। उसके प्यार में कोई शर्त नहीं, सौदा नहीं, जबर्दस्ती नहीं, अहंकार नहीं।

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'अजब प्रेम की गजब कहानी' इसीलिए विशेष बन पड़ी है कि इसमें प्रेम की उदात्तता है। न यह प्रेम जिस्मानी है न स्वार्थी। यह प्रेम निःस्वार्थ, उजला और भोला है। नायक के त्याग, उदारता और बड़प्पन की यह कहानी युवाओं को भी बहुत पसंद आ रही है। यह उन बहुत से लोगों के लिए विचार करने की बात है जो बेवजह अश्लीलता की पैरवी युवाओं के नाम पर करते हैं। युवाओं को पसंद आएगा कहकर भौंडापन फैलाना चाहते हैं। जबकि ऐसा नहीं है। युवाओं के भी अपने आदर्श और जीवन मूल्य हैं जो बहुत सुंदर हैं। उनके यह मूल्य समाज द्वारा प्रदूषित किए जाते हैं, तभी बिगड़ते हैं।

फिल्म अजब-गजब में चार्ली चैप्लिन की फिल्मों से भी प्रेरणा ली गई है। फिल्म की तैयारी के तौर पर रणबीर कपूर को चार्ली चैप्लिन की फिल्में देखने के लिए कहा गया था। एक दृश्य में रणबीर का मेकअप चार्ली चैप्लिन की तरह किया भी गया है। चार्ली की अपनी एक फिल्म में से त्यागमय प्रेम का एक दृश्य उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है। चार्ली को एक दृष्टिहीन लड़की से प्रेम हो गया है। लड़की और चार्ली पास-पास बैठे हैं। लड़की स्वेटर बुन रही है, चार्ली ऊन का गोला संभाल रहे हैं। अचानक गोला फिसल जाता है।

लड़की टटोलती है, तो ऊन का तागा उसके हाथ आ जाता है, वह फिर उसी प्रसन्न तन्मयता के साथ स्वेटर बुनने लगती है। मगर वह यह नहीं जानती कि जो तागा अब उसके हाथ लगा है वह उसके गोले का नहीं चार्ली के स्वेटर का है। इधर वह अपने हाथ का स्वेटर बुनती चलती है, उधर चार्ली का स्वेटर उधड़ता चलता है। गरीब चार्ली के लिए वह स्वेटर अमूल्य है, मगर वह लड़की की सृजनात्मक खुशी में बाधा नहीं डालता... वह चुप रहता है।

छीनना, पाना और लेना ही प्रेम नहीं है, देना भी प्रेम है। प्रियपात्र की खुशी में खुश होना भी प्रेम है। यह दार्शनिक संदेश भारी-भरकम आँसू-धाँसू, कठोर दृश्यों में पेलने के बजाय रोमांटिक-कॉमेडी के जरिए दे दिया जाए तो इससे बेहतर बात क्या हो सकती है?
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