शुक्रवार, 27 मार्च 2026
  1. सामयिक
  2. डॉयचे वेले
  3. डॉयचे वेले समाचार
  4. west bengal election voter list sir process
Written By DW
Last Updated : गुरुवार, 26 मार्च 2026 (14:28 IST)

पश्चिम बंगाल में लाखों लोगों के मताधिकार पर सवाल

विधानसभा सीटों की संख्या के लिहाज से देश के दूसरे सबसे बड़े राज्य पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले लाखों वोटर संशय में हैं। वो यह नहीं जानते कि अगले महीने विधानसभा में वोट डाल सकेंगे या नहीं।

west bengal election
प्रभाकर मणि तिवारी
पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में यह पहला मौका है जब विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान तो हो चुका है, लेकिन मतदाता सूची पूरी तरह तैयार नहीं हो सकी है। दरअसल, राज्य में एसआईआर की प्रक्रिया इतनी लंबी चल रही है कि तय समय के भीतर मतदाता सूची तैयार होने पर संशय पैदा हो गया है। इससे राजनीतिक दलों की परेशानी बढ़ गई है। राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहा है कि एसआईआर की प्रक्रिया तय समय के भीतर पूरा करने में होने वाली देरी के कारण इस बार लाखों मतदाता अगले महीने की 23 और 29 तारीख को होने वाले चुनाव में वोट डाल सकेंगे या नहीं?
 
इस बार चुनावी परिस्थिति पहले के मुकाबले एकदम अलग होने का एक कारण यह भी है कि अब एसआईआर की प्रक्रिया चुनाव आयोग के हाथों से निकल कर अदालत के हाथो में पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को इस मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया है।

पहली बार दो चरणों में मतदान

पहली बार विधानसभा चुनाव के लिए दो चरणों में मतदान होगा। इससे पहले वर्ष 2001 में आखिरी बार एक ही चरण में मतदान हुआ था। उसके बाद बीते 25 साल में कभी इतने कम चरणों में चुनाव नहीं कराए गए थे। साल 2001 के बाद होने वाले तमाम विधानसभा चुनाव क्रमशः पांच (2006), छह (2011), सात (2016) और आठ (2021) चरणों में कराए गए थे। 2001 के पहले के तमाम चुनाव भी एक ही दिन होते रहे हैं।
 
वर्ष 2021 में 27 मार्च से 29 अप्रैल के बीच आठ चरणों में मतदान हुआ था। संयोगवश इस बार भी अंतिम चरण का मतदान 29 अप्रैल को ही होगा।

अधर में लाखों वोटर

लेकिन एसआईआर की प्रक्रिया पूरी होने से पहले से ही चुनाव के एलान से 60 लाख विचाराधीन वोटरों का भविष्य अनिश्चित हो गया है। दरअसल, बीती 28 फरवरी को जब मतदाता सूची का प्रकाशन हुआ तो एसआईआर की प्रक्रिया शुरू होने से पहले बंगाल की मतदाता सूची में करीब 7।66 करोड़ वोटरों के नाम थे। लेकिन 28 फरवरी को प्रकाशित सूची में 6।44 करोड़ नाम ही थे। उनके अलावा उसमें 60 लाख से ज्यादा कुछ ऐसे वोटर थे जिनको 'तार्किक विसंगति' वाली श्रेणी में रखा गया था। यह ऐसे लोग थे जिनके दस्तावेजो में कोई गड़बड़ी थी या पिता-पुत्र की उम्र में फासला कम था। कई लोग तो अनुवाद की गलती के कारण इस श्रेणी में शामिल कर दिए।
 
चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, बीते शनिवार तक करीब 18 लाख मामलों का निपटारा ही निपटारा हुआ था। यानी अब तक करीब 42 लाख मामलों का निपटारा होना है।
 
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कलकत्ता हाईकोर्ट की निगरानी में 732 न्यायिक अधिकारी लगातार इस काम में जुटे हैं। इनमें दो पड़ोसी राज्यों—ओडिशा और झारखंड के सौ-सौ अधिकारी भी शामिल हैं।
 
झारखंड से आए एक न्यायिक अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताते हैं, "हम समय के साथ रेस लगाते हुए भारी दबाव में काम कर रहे हैं। कई बार तो हमें कंप्यूटर से सिर उठाने की फुर्सत तक नहीं मिलती। अक्सर दोपहर का खाना हड़बड़ी में निपटाना पड़ता है।" वह बताते हैं कि रोजाना कम से कम तीन सौ मामलों का निपटारा करना पड़ रहा है।
 
न्यायिक अधिकारियों का कहना है कि बांग्ला में कई जगह कुछ उपाधियां दो-दो तरीके से लिखी जाती हैं। इनमें बनर्जी या बंद्योपाध्याय, मुखर्जी या मुखोपाध्याय और चटर्जी या चट्टोपाध्याय समेत दर्जनों उपाधियां शामिल हैं। अब कई मामलों में अंग्रेजी में बनर्जी को अनुवाद के दौरान बांग्ला में बंद्योपाध्याय करने के कारण वैसे नाम 'तार्किक विसंगति' की श्रेणी में आ गए हैं। लेकिन यह फर्क वही कर सकता है जिसे बांग्ला का समुचित ज्ञान हो। बाहरी राज्यों के ज्यादातर न्यायिक अधिकारी शब्दों के इस खेल से अनजान हैं। इस वजह से ऐसे मामलों में दस्तावेजों की जांच में समय लग रहा है।
 
राज्य चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि कोलकाता के अलावा ज्यादातर जगहों की मतदाता सूची बांग्ला में होने के कारण दूसरे राज्यों से आने वाले न्यायिक अधिकारियों को दस्तावेजों की जांच में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। कुछ लोगों को इसमें दूसरों से मदद भी लेनी पड़ रही है।
 
चुनाव आयोग के सूत्रों ने भी माना है कि न्यायिक अधिकारी भारी दबाव में काम कर रहे हैं। अब भी करीब 40 लाख से ज्यादा लोगों के दस्तावेजों की जांच होनी है। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि कहा है कि नामांकन की आखिरी तारीख तक हुई जांच के आधार पर पूरक मतदाता सूची प्रकाशित की जा सकती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि उस दिन तक क्या सबके दस्तावेजों की जांच का काम पूरा हो सकेगा। जांच के काम में जुटे अधिकारियों के साथ ही चुनाव आयोग और राज्य सरकार के अधिकारी भी इस पर संदेह जता रहे हैं।

राजनीतिक दलों की आशंका

राजनीतिक दलों को आशंका है कि अगर लाखों की तादाद में लोग वोट नहीं दे पाए तो इसका असर चुनावी नतीजों पर पड़ना तय है। खासकर नजदीकी मुकाबले वाली सीटों पर इससे नतीजे बदलने की आशंका है।
 
चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि बांकुड़ा और पुरुलिया जैसे जिलों में यह काम पूरा हो गया है लेकिन अल्पसंख्यक बहुल मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण 24-परगना जिले में अभी लाखों मामलों का निपटारा होना है।
 
इससे सबसे ज्यादा खतरा सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को ही है। इसकी वजह यह है कि इन मुस्लिम-बहुल जिलों में तार्किक विसंगति की श्रेणी में शामिल वोटरों में 80 से 90 फीसदी लोग अल्पसंख्यक तबके के ही हैं। यह सत्तारूढ़ पार्टी का सबसे मजबूत वोट बैंक माना जाता है।
 
यही वजह है कि तृणमूल कांग्रेस और इसकी प्रमुख ममता बनर्जी बार-बार एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठाती रही हैं। पार्टी के प्रवक्ता कुणाल घोष डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हमारी नीति एकदम साफ है। किसी भी वैध वोटर का नाम मतदाता सूची से नहीं हटना चाहिए यानी उसे वोट डालने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।"
 
उनका आरोप है कि केंद्र सरकार,बीजेपी और चुनाव आयोग ने मिल कर वैध वोटरों के नाम काटने के लिए ही हड़बड़ी में एसआईआर की योजना बनाई थी। कुणाल का सवाल था कि दो साल के काम को दो महीने में कैसे पूरा किया जा सकता है?
 
सीपीएम के नेता मोहम्मद सलीम डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हमारा संविधान हर नागरिक को चुनाव में हिस्सा लेने का अधिकार देता है। लेकिन अभी लाखों लोगों का मताधिकार अनिश्चित है। तार्किक विसंगति वाली सूची में शामिल लोग मामले का निपटारा होने तक न तो चुनाव लड़ सकते हैं और न ही वोट डाल सकते हैं।"
 
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार कहते हैं, "चुनाव एक चरण में हों या दो चरण में, पूर्ण मतदाता सूची के बिना कोई भी चुनावी नतीजा सही नहीं होगा। इससे कई सीटों के समीकरण बदल सकते हैं।"

समय से निपटारा नहीं हुआ तो क्या होगा? 

दिलचस्प बात यह है कि पहले से ही 'नो एसआईआर, नो वोट' का नारा देने वाली बीजेपी भी तमाम वैध नागरिकों के नाम सूची में शामिल करने की वकालत कर रही है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य ने कोलकाता में पत्रकारों से कहा, "एसआईआर की प्रक्रिया शीघ्र पूरी होनी चाहिए ताकि तमाम वैध नागरिकों को चुनाव में हिस्सेदारी का मौका मिल सके।"
 
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक, हर चरण में नामांकन पत्र दाखिल करने की अंतिम तारीख तक जिन लोगों के दस्तावेजों की जांच पूरी कर हरी झंडी दिखाई जाएगी उनके नाम पूरक मतदाता सूची में शामिल किए जाएंगे और वो लोग वोट डाल सकेंगे। इस लिहाज से पहले चरण के लिए नामांकन की अंतिम तारीख छह अप्रैल और दूसरे चरण के लिए नौ अप्रैल है। लेकिन तब तक अगर किसी के मामले का निपटारा नहीं होता तो उनका क्या होगा, इस सवाल का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है।
 
राजनीतिक विश्लेषक भी तय समय के भीतर मतदाता सूची तैयार होने पर संशय जता रहे हैं। उनका कहना है कि बंगाल में इससे पहले किसी चुनाव से पहले ऐसी परिस्थिति नहीं देखी गई थी। इस बार हालत अभूतपूर्व कही जा सकती है। राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर रहीं डा। शुभ्रा गांगुली डीडब्ल्यू से कहती हैं, "जिस रफ्तार से काम चल रहा है उसमें यह मुश्किल ही लगता है।"
 
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "यह एक अभूतपूर्व परिस्थिति है। आयोग ने अगर पहले ही दस्तावेजों की छोटी-छोटी गलतियों या अनुवाद की कमियों पर ध्यान दिया होता तो 'तार्किक विसंगति' की सूची इतनी बड़ी नहीं होती। लेकिन अब तो बस इसके समय पर पूरा होने की उम्मीद ही की जा सकती है।"