‘माया’ नहीं रही, चलती रहेगी कालगणना

2012 के साथ दुनिया का अंत नहीं होगा

PR
फरवरी के मध्य में इस बार जर्मनी सहित सारे यूरोप में अपूर्व ठंड से हाहाकार मचा हुआ था। सैकड़ों लोग मर गए। लग रहा था, यदि सचमुच कोई प्रलय आने वाला है, तो इस बार वह जरूर हिमयुग के रूप में आयेगा। ठीक उसी समय, 10 से 12 फरवरी तक, जर्मनी की पुरानी राजधानी बॉन के विश्वविद्यालय में दुनिया भर के ऐसे विद्वानों और वैज्ञानिकों का जमघट लगा था, जो मध्य अमेरिका की प्राचीन माया सभ्यता के शोधी हैं।

आगामी 21 दिसंबर को दुनिया के कथित अंत की माया-भविष्यवाणी ही उनके बीच चर्चा-परिचर्चा का मुख्य विषय था। उन्होंने माया सभ्यता पर प्रकाश डालने वाले पुरातात्विक अवशेषों, शिलालेखों, चित्रों और पांडुलिपियों को छान मारा है और जानते हैं कि उनमें दुनिया के कथित अंत के बारे में क्या कहा गया है।

माया कालगणना चलती रहेगी : 'माया लोगों के लिए 21 दिसंबर के साथ ही कालगणना का अंत नहीं हो जाता,' बॉन विश्वविद्यालय में प्राचीन अमेरिकी सभ्यताओं के प्रोफेसर डॉ. निकोलाई ग्रूबे ने कहा, 'माया कैलेंडर इसके बाद भी चलता रहेगा।'

माया कैलेंडर को लेकर मचे कोहराम की तुलना उन्होंने पहली जनवरी 2000 के दिन शताब्दी और सहस्त्राब्दि के परिवर्तन को लेकर फैली आशंकाओं और भ्रांतियो के साथ की- 'वह मात्र एक कालचक्र का अंत था, जिसके साथ एक नई सहस्त्राब्दि शुरू हुई। ठीक उसी तरह, 21 दिसंबर के दिन माया सभ्यता का 400 वर्षों वला चालू कालचक्र पूरा होगा और साथ ही एक नया कालचक्र शुरू होगा।'

प्रो. ग्रूबे का कहना था कि अधकचरे जानकारों और निहितस्वार्थी लोगों ने माया कैलेंडर के बारे में जानबूझ कर ढेर सारे भ्रम फैला रखे हैं। कुछ लोग तो खुद ही पैगंबर या भविष्यवक्ता बन बैठे हैं और कुछ दूसरे गूढ़ज्ञान के ज्ञाता। सभी अपनी-अपनी डफली पर अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। आम आदमी को उल्लू बना कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। सनसनी-भक्त मीडिया और इंटरनेट के रसिया बचीखुची कसर पूरी कर रहे हैं।

नहीं रही माया सभ्यता : 900 से 300 ईसा-पूर्व के बीच अपने स्वर्णयुग वाली लगभग तीन हजार वर्षों तक चली माया सभ्यता के लोग आज के मेक्सिको के दक्षिण-पूर्वी यूकातान प्रायद्वीप, बेलीज, गुआटेमाला और होंडूरास में रहा करते थे। उनकी अपनी भाषा और अपनी चित्रलिपी थी। 1511 में स्पेनी उपनिवेशवादियों के यूकातान पहुंचने के साथ माया सभ्यता का पतन शुरू हुआ।

कुछ तो महामारियों, सूखे और अकाल के कारण, पर मुख्य रूप से स्पेनी आक्रमणकारियों और ईसाई धर्मप्रचाकों के कारण मायावंशियों की संख्या तेजी से घटने लगी। स्पेनियों ने उनके देवालयों, पुस्तकालयों और सांस्कृतिक स्मारकों की इस तरह होली जलाई या उन्हें तहस-नहस कर दिया कि यथासंभव कुछ भी न बचे। तब भी माया जाति पूरी तरह मिट नहीं गई है। मध्य अमेरिका के इन देशों में अब भी अनुमानतः 70 लाख मायावंशी इंडियन रहते हैं।

विदेशियों ने खींचा मायावंशियों का ध्यान : वे बेखबर थे कि उनके पूर्वजों के कैलेंडर को लेकर, जिसके अनुसार इस समय सन 5125 चल रहा है, कोई हो-हल्ला मच सकता है। 'उनका ध्यान इस तरफ उन विदेशी पर्यटकों की बढ़ती हुई भीड़ के कारण गया, जो अचानक माया कैलेंडर में भारी रुचि लेने लगे हैं', कहना था जर्मनी में हैम्बर्ग विश्वविद्यालय के माया-शोधी लार्स फ्रुइजोर्गे का। फ्रुइजोर्गे के अनुसार, अब वे भी बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं। सभा-सम्मेलनों और कर्मकांडी अनुष्ठानों के द्वारा अपनी तरफ दुनिया का ध्यान खींचने का मौका नहीं चूकना चाहते।

बॉन विश्वविद्यालय के मध्य अमेरिका अध्ययन संस्थान द्वारा आयोजित सम्मेलन और प्रदर्शनी को भी एक ऐसा ही आयोजन कहा जा सकता है। माया कैलेंडर के बारे में फैलाई जा रही अफवाहों के बहाने से इस गौरवशाली सभ्यता की तरफ लोगों का ध्यान खींचने और उसके पठन-पाठन के प्रति रुचि जगाने का वह एक विज्ञान-सम्मत प्रयास था। संस्थान के प्रमुख प्रो. निकोलाई ग्रूबे ने अपने व्याख्यान में कहा कि माया लोगों की सभ्यता और संस्कृति इतनी बड़ी व रोचक है कि उसे 2012 की 21 दिसंबर वाली कम्बख्त तारीख तक ही सीमित नहीं किया जा सकता।

केवल दो ऐतिहासिक अभिलेख : माया सभ्यता के जानकारों का कहना है कि इस समय केवल दो ऐसे ऐतिहासिक अभिलेख उपलब्ध हैं, जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि माया-भविष्यवाणी में ऐसा समुच कहा गया है या नहीं कि 21 दिसंबर 2012 के दिन दुनिया का अंत हो जाएगा। एक तो है लगभग 1300 वर्ष पुराना एक शिलालेख और दूसरा है लगभग 800 वर्ष पुरानी एक हस्तलिखित पांडुलिपि।

माया सभ्यता के जर्मन विशेषज्ञों में से एक हैं स्वेन ग्रोनेमायर। मेक्सिको की खाड़ी के पास तोर्तुगुएरो नामक स्थान पर हुए उत्खनन में कोई चार साल पहले एक शिलालेख मिला था। ग्रोनेमायर ने इस शिलालेख का बारीकी से अध्ययन किया है और उसकी चित्रलिपि को स्वयं पढ़ा है। उनका कहना है कि शिलालेख पर लिखा संदेश करीब 1300 पहले उकेरा गया था। यह शिलाखंड (पत्थर) कुछ इस तरह से टूट गया है कि लेख का अंतिम हिस्सा ठीक से पढ़ा नहीं जा सकता।

1300 वर्ष पुराना शिलालेख : शिलालेख में वर्णन है कि 398 वर्षों तक तक चलने वाले 13 वें माया कालखंड के अंत के साथ (जो हमारे वर्तमान ईस्वी सन के अनुसार 21 दिसंबर 2012 को पड़ना चाहिए) माया-देवता 'बोलोन योक्ते' की वापसी होगी। ग्रोनेमायर कहते हैं कि शिलालेख से ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता कि इस दिन के आने या 'बोलोन योक्ते' की वापसी के साथ प्रलय आएगा या दुनिया का अंत हो जाएगा।

ग्रोनेमायर बताते हैं कि माया-कैलेंडर 3114 ईस्वी पूर्व शुरू होता है। इस समय उसका 'बाकतून' कहलाने वाला गणनाचक्र चल रहा है (हर 18,72,000 दिन, यानी लगभग 5128 वर्ष बाद बाकतून कालखंड पुनः आता है)।

राम यादव|
मध्य अमेरिकी देशों की महिमामंडित माया सभ्यता लगभग तीन हजार वर्षों तक चली थी। स्पेनी उपनिवेशवादियों के हमलों के साथ सोलहवीं सदी में उसका पतन हो गया। आगामी 21 दिसंबर 2012 को उसके कैलेंडर के 400 वर्षों से चल रहे 13वें कालचक्र का भी अंत हो जाएगा। लेकिन, हर गाहेबगाहे दुनिया के अंत की भविष्यवाणी करने वाले प्रलयवादी पोंगापंथी और मतलबपरस्त मीडिया मास्टर ढिंढोरा पीटने में जुटे हुए हैं कि माया कैलेंडर के साथ ही दुनिया का भी अंत हो जाएगा। दुनिया का अंत तो इस बार भी नहीं होगा, हां इन प्रलयवादियों को अगले प्रलय के नए बहकावे की एक नई तारीख जरूर ढूंढनी पड़ेगी।
वर्तमान 13वें बाकतून चक्र में माया-देवता 'बोलोन योक्ते' की वापसी तक के जिस समय का उल्लेख मिलता है, उसका अवतरण माया-कैलेंडर शुरू होने के ठीक 5125 वर्ष बाद होना चाहिए। इसे आधार बना कर गणना करने पर 21 दिसंबर 2012 वह दिन निकलता है, जब इस माया-देवता को वापस आना चाहिए। उसके बाद एक नये गणनचक्र वाला एक नया कालखंड शुरू होना चाहिए।...अगली किस्त में पढ़ें...क्या लौटेगा सृष्टि रचयिता...?

 

और भी पढ़ें :