1. लाइफ स्‍टाइल
  2. नन्ही दुनिया
  3. कविता

क्या होता है रमतूला

बाल कविता
मम्मी मुझको नहीं खेलने,
देती हैं अब घर घूला।
ना ही मुझे बनाने देती,
गोबर मिट्टी का चूल्हा।

गपइ समुद्दर क्या होता है,
नहीं जानता अब कोई।
गिल्ली डंडे का टुल्ला तो,
बचपन बिल्कुल ही भूला।

अब तो सावन खेल रहा है,
रात और दिन टी वी से।
आम नीम की डालों पर अब,
कहीं नहीं दिखता झूला।

अब्ब्क दब्बक दांय दीन का,
बिसरा खेल जमाने से।
अटकन चटकन दही चटकन,
लगता है भूला भूला।

ना ही झड़ी लगे वर्षा की,
ना ही चलती पुरवाई।
मौसम हुआ सिरफिरा पागल,
वक्त हुआ ल‍गड़ा लूला।

ऐसी चली हवा पश्चिम की,
हम खुद को ही भूल गए।
गुड़िया अब ये नहीं जानती,
क्या होता है रमतूला।
लेखक के बारे में
प्रभुदयाल श्रीवास्तव
12, शिवम सुंदरम नगर, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश (Mo.-+919131442512).... और पढ़ें