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बाल कविता : लालच

poem on jalebi
निकल कड़ाही से जब बाहर,
गरम जलेबी आई।



 



एक पड़ोसन मक्खी झटपट,
खाने को ललचाई।
 
कूदी गरम जलेबी पर तो,
बना वहीं पर भुर्ता।
 
हाय-हाय कर बैठे ग्राहक,
उसे देखकर मरता।
 
लालच बुरी बला होती है,
मेरे प्यारे भाई।
 
लालच जो करते हैं उन पर,
ही यह शामत आई।

 
लेखक के बारे में
प्रभुदयाल श्रीवास्तव
12, शिवम सुंदरम नगर, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश (Mo.-+919131442512).... और पढ़ें