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बाल गीत : गुड़िया के क्या कहने

Updated: बुधवार, 10 जनवरी 2024 (13:20 IST)
कमर में करधन नाक में बाली,
हाथ में कंगन पहने हैं।
अहा! अहा! री गुड़िया रानी,
तेरे अब क्या कहने हैं।
 
तीन साल की उमर सलोनी,
फुदक-फुदक कर चलती है।
नहीं संभल पाती, दादी की,
गोद में जाकर गिरती है।
दादी को भी मजे-मजे से,
उसके नखरे सहने है।
 
दादाजी ने रबर पेंसिल,
कॉपी एक दिला दी है।
लेकिन यह क्या गुड़िया ने तो,
क्या दुर्दशा बना दी है।
पन्ने फाड़-फाड़ कॉपी के,
झंडे रोज फहरने हैं।
 
गुड्डा-गुड़ियों के संग गुड़िया,
रोज तमाशा करती है।
नाक खीचती कभी, किसी के,
दोनों कान पकड़ती है।
इसी तरह से रोज खिलोने,
तोड़-ताड़ कर धरने है।
 
नटखट प्यारी बातों से वह,
मन सबका हर लेती है।
उधम करते-करते ही वह  
घर वश में कर लेती है|
हंसती है तो लगता जैसे,
झर-झर झरते झरने हैं। 

(वेबदुनिया पर दिए किसी भी कंटेट के प्रकाशन के लिए लेखक/वेबदुनिया की अनुमति/स्वीकृति आवश्यक है, इसके बिना रचनाओं/लेखों का उपयोग वर्जित है...)
लेखक के बारे में
प्रभुदयाल श्रीवास्तव
12, शिवम सुंदरम नगर, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश (Mo.-+919131442512).... और पढ़ें

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