मध्य पूर्व (Middle East) में ईरान और इसराइल के बीच बढ़ते तनाव ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की नींद उड़ा दी है। कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। जहां भारत और अमेरिका जैसे देश ईंधन की बढ़ती कीमतों और सप्लाई चेन टूटने के डर से सहमे हुए हैं, वहीं चीन इस वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच बेहद सुकून में नजर आ रहा है।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक (Oil Importer) होने के बावजूद चीन को इस युद्ध से डर नहीं लग रहा? आइए समझते हैं चीन की उस 'मास्टरस्ट्रोक' रणनीति को, जिसने उसे आज एक मजबूत कवच दे दिया है।
1. तेल के खेल में चीन का 'बफर' प्लान
ईरान-इसराइल संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव चरम पर है। कई एशियाई देश ऊर्जा बचाने के लिए यूनिवर्सिटी बंद कर रहे हैं और वर्किंग डेज घटा रहे हैं, लेकिन चीन पर इसका असर न के बराबर है। 'ऑक्सफोर्ड इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी स्टडीज' की मिशल मेदान के अनुसार, चीन ने पिछले कुछ वर्षों में इतना मजबूत बफर (Buffer) तैयार कर लिया है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उछाल उसकी अर्थव्यवस्था की रफ्तार नहीं रोक पा रहा।
2. EV क्रांति: चीन का सबसे बड़ा हथियार
चीन ने दशकों पहले समझ लिया था कि विदेशी तेल पर निर्भरता उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। आज चीन में बिकने वाली आधी से ज्यादा कारें इलेक्ट्रिक (EV) या हाइब्रिड हैं।
सब्सिडी का जादू: चीन सरकार ने 2016 से 2022 के बीच ऑटो कंपनियों को $5 बिलियन से ज्यादा की सब्सिडी दी।
BYD का दबदबा: इसी रणनीति का नतीजा है कि चीन की कंपनी BYD ने टेस्ला को पछाड़कर दुनिया की नंबर-1 इलेक्ट्रिक कार कंपनी बनने का गौरव हासिल किया।
भारी ट्रक भी इलेक्ट्रिक: केवल कारें ही नहीं, चीन में बिकने वाले लगभग एक-तिहाई भारी ट्रक अब पूरी तरह से इलेक्ट्रिक हैं। इसके मुकाबले अमेरिका में 2025 तक केवल 22% कारें ही इलेक्ट्रिक या हाइब्रिड थीं।
3. 'मलक्का संकट' से 'ऊर्जा सुरक्षा' तक का सफर
2000 के दशक में चीनी नेता हू जिंताओ को डर था कि युद्ध की स्थिति में मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) से होने वाली तेल सप्लाई रुक सकती है। इसे 'मलक्का डिलेमा' कहा गया। इसके जवाब में चीन ने:
विशाल आपातकालीन पेट्रोलियम भंडार बनाए।
सौर, पवन, पनबिजली और परमाणु ऊर्जा में भारी निवेश किया।
अपनी निर्भरता कोयले (50%) और नवीकरणीय ऊर्जा पर शिफ्ट कर दी, जिससे तेल और गैस का हिस्सा घटकर केवल 25% रह गया।
क्या चीन पूरी तरह सुरक्षित है?
भले ही चीन ने खुद को काफी हद तक बचा लिया है, लेकिन वह पूरी तरह अछूता नहीं है।
पेट्रोकेमिकल्स की जरूरत: फैक्ट्रियों को कच्चा माल बनाने के लिए आज भी तेल की जरूरत पड़ती है।
आम जनता पर बोझ: हाल ही में तेल की कीमतें बढ़ने पर चीन के गैस स्टेशनों पर लंबी कतारें देखी गईं। सोशल मीडिया ऐप 'रेडनोट' (Rednote) पर लोग अपनी निराशा जाहिर कर रहे हैं। बीजिंग ने खुदरा तेल कीमतों में 5% की बढ़ोतरी की है, जिससे पेट्रोल अब लगभग $4.20 प्रति गैलन मिल रहा है। चीन का यह बदलाव पर्यावरण प्रेम से ज्यादा अपनी 'ऊर्जा सुरक्षा' (Energy Security) सुनिश्चित करने के लिए था। आज जब मिडिल ईस्ट सुलग रहा है, तो चीन की यही दूरदर्शिता उसे वैश्विक मंदी के खतरे से बचा रही है।