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Last Modified: नई दिल्ली , सोमवार, 16 मार्च 2026 (13:24 IST)

विश्वगुरू से विश्वमित्र, क्या नरेन्द्र मोदी बनेंगे 'संकटमोचक'

ब्रिक्स से शांति का अरमान : क्या भारत कराएगा ईरान-इजराइल के बीच सुलह?

Narendra Modi
PM Narendra Modi: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और युद्ध की आहट के बीच ईरान ने एक बड़ा कूटनीतिक दांव चला है। तेहरान ने संकेत दिया है कि भारत, जो वर्तमान में ब्रिक्स (BRICS) समूह का अध्यक्ष है, अपनी प्रभावशाली स्थिति का उपयोग करके अमेरिका और इजराइल के साथ बातचीत की मेज पर बैठे और तनाव कम करने में 'बड़े भाई' की भूमिका निभाए।

ईरान की भारत से बड़ी उम्मीदें

ईरानी विदेश मंत्रालय के सूत्रों और हालिया उच्चस्तरीय वार्ताओं के अनुसार, तेहरान चाहता है कि भारत केवल एक मूकदर्शक न रहे, बल्कि ब्रिक्स के मंच का उपयोग कर एक 'रचनात्मक हस्तक्षेप' करे। ईरान का मानना है कि भारत के संबंध वाशिंगटन और तेल अवीव, दोनों से बेहद मजबूत हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैश्विक साख इस संकट को टालने में मदद कर सकती है।
 
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची ने हाल ही में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ अपनी बातचीत में इस बात पर जोर दिया कि ब्रिक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों को क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए आगे आना चाहिए।

भारत के लिए कूटनीतिक 'अग्निपरीक्षा'

भारत के लिए यह स्थिति किसी दोधारी तलवार से कम नहीं है। नई दिल्ली के सामने कई चुनौतियां हैं:
  • ब्रिक्स की एकता : ब्रिक्स में अब सऊदी अरब और यूएई जैसे देश भी शामिल हैं, जिनके हित ईरान से अलग हो सकते हैं।
  • रणनीतिक संतुलन : भारत एक तरफ इजराइल का रणनीतिक साझेदार है, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ उसके 'चाबहार बंदरगाह' जैसे बड़े प्रोजेक्ट और ऐतिहासिक संबंध जुड़े हैं।
  • ऊर्जा सुरक्षा : खाड़ी में तनाव बढ़ने से कच्चा तेल महंगा हो सकता है, जिसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
विशेषज्ञों की राय है में ईरान का यह प्रस्ताव दिखाता है कि दुनिया अब भारत को केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि एक 'विश्व मित्र' और 'संकटमोचक' के रूप में देख रही है। हालांकि, अमेरिका और इजराइल को बातचीत के लिए राजी करना भारत की कूटनीति की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
 
हालांकि भारत ने अभी तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिबद्धता नहीं जताई है, लेकिन विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया है कि भारत हमेशा संवाद और कूटनीति के पक्ष में रहा है। ब्रिक्स देशों के आगामी सम्मेलनों में यह मुद्दा केंद्र में रहने की संभावना है। 
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