राष्ट्र ने मुझसे कहा : तू मुझसे आभारी है। साँस लेने की हवा के लिए पीने के पानी के लिए रोटी खाने के लिए चलने के रास्ते के लिए बैठने की फर्श के लिए
मैंने राष्ट्र से पूछा : तो मेरी माँ के दम घुट-घुटके मर जाने का जवाब कौन देगा ? कौन जवाब देगा जहर खायी बहिन को ? भीख माँग आवारा घूमती नानी को ? तेरे बारे में सुनहले सपने देख-देखके गरीबी में मरे पड़े बाप को ? कौन जवाब देगा, बोल ? तुझे आजादी दिलाने जेल गए तेरे भाई को ?
हवा ने कहा : मैं किसी का नहीं पानी ने कहा : मेरा कोई मालिक नहीं चावल ने कहा : मैं मिट्टी का बनाया हूँ रास्ते ने कहा : मुझ पर सीमाएँ लागू नहीं फर्श ने कहा : घास का अपना कोई राष्ट्र नहीं।
तब राष्ट्र ने लाड-प्यार से मुझे ऊपर उठाया, फाँसी के पेड़ की तरफ। और पूछा : अब मालूम हुआ कि राष्ट्र है ? मेरे दबोचे गले से टपकी खून की बूँद ने फर्श पर लिखा : हाँ, राष्ट्र है।