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poem | पुकार सुनने को तरसती रही

पुकार
शोभना चौरे
NDND
सपने सजाती रही रात भर
पर आँखों से नींद दूर रही

ह्रदय विकलता के आँसू बहाता रहा
पर आँखें मेरी सूखी रही

लुटती रही अपनों के बीच
बाजार में मंदी छाई रही

शब्द मुखर होते रहे
भावना शून्य हो जुड़ते रहें

संदेस पर संदेस आते रहें
पर पुकार सुनने को तरसती रही

आकाश चाँद-सितारों से
सजता रहा रात भर
मेरी सेज सूनी रही।