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Written By WD

धरती आज फिर अलाव पर है

धरती अलाव समुद्रों
- आलोक श्रीवास्तव

जो आज बैठे है
घरों की साँकल लगाकर
नहीं जानते
सातों समुद्रों में
कहीं नहीं है आज खामोश तरंगे
जिन्‍होंने सुनी नहीं
वे आवाजे
जो उत्‍तर से, पूरब से
दक्षिण और पश्चिम से
चली आईं
उन्‍हीं बुलात
वे बेशक जितना भी सिमटें
जितना भी भागें
बच नहीं पाएँगे
समय के पंजों स
धरती आज फिर
अलाव पर है।
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