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धरती आज फिर अलाव पर है
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आलोक श्रीवास्तव जो आज बैठे हैंघरों की साँकल लगाकरनहीं जानते सातों समुद्रों मेंकहीं नहीं है आज खामोश तरंगेंजिन्होंने सुनी नहीं वे आवाजेंजो उत्तर से, पूरब सेदक्षिण और पश्चिम सेचली आईंउन्हीं बुलातेवे बेशक जितना भी सिमटेंजितना भी भागेंबच नहीं पाएँगेसमय के पंजों सेधरती आज फिरअलाव पर है।