वे आये लाल झंडे और अचंचल कदमों से, हमारे प्रिय सखा होकर,
उन्होंने हमें दिए, भूमि, जल, आकाश, अभिमान।
वे फिर आये काले बंदूक और चंचल कदमों से, हमारे अपने दुश्मन होकर
उन्होंने हमसे हड़प लिए भूमि, जल, आकाश, अभिमान।
झंडे ऐसे भी लाल हो सकते हैं हँसिया भी स्वस्तिक बन सकते हैं हथौड़े में पाँच कीलों के चिन्ह लग सकते हैं
नक्षत्र दूसरे झंडों से भी आ सकते हैं लेनिन लेनिन, सलीम सलीम भी बन सकते हैं यूक्रैन, प्राग, ब्रास्टिस्लाविया ... रूमेनिया, कम्पूचिया, अलबेनिया ... वह मूँछ अब भी बढ़ रही है।