1. लाइफ स्‍टाइल
  2. »
  3. साहित्य
  4. »
  5. काव्य-संसार

ठंड आई है अपने पंख फैलाकर

शोभना चौरे

ठंड
NDND
अब आई है ठंड

अपने पंख

फैलाकर घर की चौखट सजी है

धूप के टुकडों से।

दादी बैठी खटिया पर,

मालिश का तेल लेकर

दादाजी कम्बल ओढे बैठे हैं,

टीवी के सामने

नन्हा पानी को देखकर,

सर पर रजाई ओढ़कर

फ़िर सो गया।

पापा टीवी के सामने बैठकर

हाथ में पेपर

लेकर चाय पर चाय गुड़क रहे है

दीदी फटाफट

तैयार हो गई है कॉलेज जाने के लिए

माँ फिरकनी सी

कभी पराठे सेंकती

कभी हलवा बनाती।

तरस गई है

कुनकुनी धूप के लिए

मैं भी कब तक बचूँगा,

पढाई करने के

बहाने बैठा रहकर

NDND
नहाकर

नहीं गया तो कक्षा के

बाहर कर दिया

जाऊँगा

तब बरामदे से

फ़िर ठंडी हवा मेरे कानों को चूमेगी

इससे अच्छा है मैं इस ठंड का

स्वागत उसके पंखों को

छूकर कर लूँ।