ठंड आई है अपने पंख फैलाकर
शोभना चौरे
अब आई है ठंड अपने पंखफैलाकर घर की चौखट सजी है धूप के टुकडों से। दादी बैठी खटिया पर,मालिश का तेल लेकरदादाजी कम्बल ओढे बैठे हैं,टीवी के सामनेनन्हा पानी को देखकर,सर पर रजाई ओढ़करफ़िर सो गया। पापा टीवी के सामने बैठकर हाथ में पेपरलेकर चाय पर चाय गुड़क रहे है दीदी फटाफटतैयार हो गई है कॉलेज जाने के लिएमाँ फिरकनी सी कभी पराठे सेंकतीकभी हलवा बनाती। तरस गई है कुनकुनी धूप के लिए मैं भी कब तक बचूँगा,पढाई करने केबहाने बैठा रहकर
नहाकरनहीं गया तो कक्षा केबाहर कर दियाजाऊँगा तब बरामदे सेफ़िर ठंडी हवा मेरे कानों को चूमेगीइससे अच्छा है मैं इस ठंड कास्वागत उसके पंखों कोछूकर कर लूँ।