जाकर तूफानों से कह दो
-कन्हैयालाल नंदन
जो कुछ तेरे नाम लिखा है, दाने-दाने में वह तुझे ही मिले चाहे रखा हो तहखाने मेंतूने इक फरियाद लगाई उसने हप्ता भर माँगाकितने हप्ते और लगेंगे उस हप्ते के आने मेंएक दिए की जिद है आँधी में भी जलते रहने कीहमदर्दी हो तो फिर हिस्सेदारी करो बचाने मेंआँसू आए देख टूटता छप्पर दीवारो-दर कोआखिर घर था, बरसों लग जाते हैं, उसे बनाने मेंकुछ तो सोचो रोज वहीं क्यों जाकर मरना होता हैशाम की कुछ तो साजिश होगी सूरज तुम्हें दबाने मेंजाकर तूफानों से कह दो जितना चाहे तेज चलेंकश्ती को अभ्यास हो गया लहरों से लड़ जाने में।