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कौन है आख़िर सच्चा हमदम

यही ज़िंदगी है प्यारे ....

सच्चा हमदम
विलास पंडित 'मुसाफिर'
NDND
थोड़ी ख़ुशियाँ थोड़े से ग़म, यही ज़िंदगी है प्यारे
काम है ज्यादा वक्त बहुत कम, यही ज़िंदगी है प्यारे

परछाई भी दिन की साथी, शाम ढले छुप जाती है
कौन है आख़िर सच्चा हमदम, यही ज़िंदगी है प्यारे

ग़म ने तो आँसू ही आँसू दामन में बरसाएँ पर
ख़ुशियों में भी आँख हुई नम, यही ज़िंदगी है प्यारे

पैदा होना, लिखना-पढ़ना, दुख से लड़ना, मर जाना
जीवन के बस चार ही मौसम, यही ज़िंदगी है प्यारे

सोचो दो सड़कें भी अक्सर दो राहे पर मिलती है
बन जाए कुछ रिश्ते बाहम, यही ज़िंदगी है प्यारे।