एक केसरिया शब्द
फाल्गुनी
ND
एक कच्चा अधपका चाँद
मुँडेर पर आ खड़ा है,
आज फिर
बह रहा है
नस-नस में शहद।
आज फिर
घुली है हवा में
चंपई गंध,
आज फिर
तुम्हारी चित्रकारी के
हरे-पीले रंग,
हो गए हैं मेरी मुट्ठी में बंद,
उस दिन शायद
सिंदूरी था तुम्हारा अक्स,
तब ही तो आज फिर
अटक गया है
नर्म साँझ के धुंधलके में
तुम्हारा एक केसरिया शब्द,
आज फिर तुम्हारी याद का
बस एक कोमल पल,
बन गया है
मेरी सूखी आँखों का
रंगहीन जल।

