तीन तलाक़ को तलाक़...

Divorce
अन्त है एक कुप्रथा का।
अन्याय से पीड़ित, बेबस, अबलाओं की व्यथा का।।
हर जागरूक युवक भी समझता था, यह बीते युग की कलंक कहानी है।
अन्यायी है, अतार्किक है, धर्म के ठेकेदारों की मनमानी है।।

जाने कब की चली थी रूढ़ि यह, लांछन थी एक बेबस समाज पर।
अंधी तलवार सी दकियानूसी ज़माने की, लटकी थी मुस्लिम युवतियों के आज पर।।

लगभग सारे मुस्लिम देश कब के, मुक्त हो चुके थे इस अपयश से।
भारतीय अबलाएं मांगती थी रोकर निजात इस कुप्रथा कर्कश से।।

बेबस महिलाओं के सुख का अब चाहे जब न क्रूर हरण होगा।
क़ानूनी संरक्षण में निश्चय ही उनका सच्चा सशक्तिकरण होगा।।

 

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