कवि अटल जी की कविता : रोते-रोते रात सो गई रोते-रोते रात सो गई झुकी न अलकें झपी न पलकें सुधियों की बारात खो गई। दर्द पुराना, मीत न जाना, बातों में ही प्रात: हो गई। घुमड़ी बदली, बूंद न निकली, बिछुड़न ऐसी व्यथा बो गई। ALSO READ: जब जनता पार्टी टूटी थी तो यह रचा था कवि अटल ने... ALSO READ: अटल जी की कविता : क्या खोया, क्या पाया जग में ALSO READ: जब मौत से सामना हुआ अटल जी का तो उनकी कलम ने यह रचा हमारे साथ WhatsApp पर जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें हमारे साथ Telegram पर जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें