मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026
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सुर्ख़ फूल पलाश के...

Palash flowers
सुर्ख़ फूल पलाश के, जब खिलते हैं तो फ़िज़ा सिंदूरी हो जाती है। पेड़ की शाख़ें दहकने लगती हैं और पेड़ के नीचे ज़मीन पर बिखरे पलाश के फूल माहौल को रूमानी कर देते हैं। पलाश को कई नामों से जाना जाता है, जैसे पलास, परसा, ढाक, टेसू, किंशुक, केसू। पलाश का दरख़्त बहुत ऊंचा नहीं होता यानी दर्मियाने क़द का होता है। इसके फूल सुर्ख़ रंग के होते हैं, इसीलिए इसे ’जंगल की आग’ भी कहा जाता है।

यह तीन रूपों में पाया जाता है, मसलन वृक्ष रूप में, झाड़ रूप में और बेल रूप में। लता पलाश दो क़िस्म का होता है। सुर्ख़ फूलों वाला पलाश और सफ़ेद फूलों वाला पलाश। सुर्ख़ फूलों वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है, जबकि सफ़ेद फूलों वाले लता पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया पार्वीफ्लोरा है। एक पीले फूलों वाला पलाश भी होता है।
 
पलाश दुनियाभर में पाया जाता है। पलाश मैदानों, जंगलों और ऊंचे पहाड़ों पर भी अपनी ख़ूबसूरती के जलवे बिखेरता है। बग़ीचों में यह पेड़ के रूप में होता, जबकि जंगलों और पहाड़ों में ज़्यादातर झाड़ के रूप में पाया जाता है। लता रूप में यह बहुत कम मिलता है। सभी तरह के पलाश के पत्ते, फूल और फल एक जैसे ही होते हैं। इसके पत्ते गोल और बीच में कुछ नुकीले होते हैं, जिनका रंग हरा होता है। 
 
पत्ते सीकों में निकलते हैं और एक में तीन-तीन पत्ते होते हैं। इसकी छाल मोटी और रेशेदार होती है। पलाश की लकड़ी टेढ़ी-मेढ़ी होती है। इसका फूल बड़ा, आधे चांद जैसा और गहरा लाल होता है। फागुन के आख़िर में इसमें फूल लगते हैं। जिस वक़्त पलाश फूलों से लद जाता है, तब इसके हरे पत्ते झड़ चुके होते हैं। पलाश के दरख़्त पर सिर्फ़ फूल ही फूल नज़र आते हैं। फूल झड़ जाने पर इसमें चौड़ी फलियां लगती हैं, जिनमें गोल और चपटे बीज होते हैं। 
 
पलाश के अमूमन सभी हिस्से यानी पत्ते, फूल, फल, छाल और जड़ बहुत काम आते हैं। पलाश के फूलों से रंग बनाए जाते हैं। फलाश के फूल कई बीमारियों के इलाज में भी काम आते हैं। पत्तों से पत्तल और दोने आदि बनाए जाते हैं। इनसे बीडियां भी बनाई जाती हैं। बीज दवाओं में इस्तेमाल किए जाते हैं।

छाल से निकले रेशे जहाज़ के पटरों की दरारों में भरने के काम आते हैं। जड़ की छाल के रेशे से रस्सियां बटी जाती हैं। इससे दरी और काग़ज़ भी बनाया जाता है। इसकी छाल से गोंद बनाया जाता है, जिसे 'चुनियां गोंद' या पलाश का गोंद कहते हैं। इसकी पतली डालियों से कत्था बनाया जाता है, जबकि मोटी डालियों और तनों को जलाकर कोयला तैयार किया जाता है। 
 
पलाश हिंदुओं के पवित्र माने जाने वाले वृक्षों में से है। इसका ज़िक्र वेदों तक में मिलता है। आयुर्वेद ने इसे ब्रह्मवृक्ष कहा है। मान्यता है कि इस वृक्ष में तीनों देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश का निवास है। पलाश का धार्मिक महत्व भी बहुत ज़्यादा है। पलाश का इस्तेमाल ग्रहों की शांति में किया जाता है। इसकी डंगाल हवन पूजन में काम आती है। पेड़ की जड़ से ग्रामीण सोहई बनाते हैं, जिसे दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजन को अपने गाय-बैलों को बांधते हैं। 
 
पलाश कवियों और साहित्यकारों का भी प्रिय वृक्ष है, इस पर अनेक रचनाएं रची गई हैं और रची जा रही हैं।
 
(वेबदुनिया पर दिए किसी भी कंटेट के प्रकाशन के लिए लेखक/वेबदुनिया की अनुमति/स्वीकृति आवश्यक है, इसके बिना रचनाओं/लेखों का उपयोग वर्जित है...)ALSO READ: नज़्म: दहकते पलाश का मौसम...
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